Edited By Ramkesh,Updated: 27 Jan, 2026 08:36 PM

नीट-पीजी 2025 की परीक्षाओं में 800 अंकों में से माइनस 40 अंक पाने वाले एससी/एसटी/ओबीसी विद्यार्थियों को काउंसलिंग में बैठने की अनुमति देने के राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान परीक्षा बोर्ड (एनबीईएमएस) के निर्णय को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका इलाहाबाद...
प्रयागराज: नीट-पीजी 2025 की परीक्षाओं में 800 अंकों में से माइनस 40 अंक पाने वाले एससी/एसटी/ओबीसी विद्यार्थियों को काउंसलिंग में बैठने की अनुमति देने के राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान परीक्षा बोर्ड (एनबीईएमएस) के निर्णय को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मंगलवार को खारिज कर दी।
अदालत को जब यह बताया गया कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर दाखिल एक जनहित याचिका यह कहते हुए पहले ही खारिज कर दी है कि यह एक नीतिगत मामला है और अदालत का इससे कोई लेना देना नहीं है, तो मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की पीठ द्वारा यह याचिका खारिज कर दी गई। अदालत को यह भी बताया गया कि इस मामले में एक दूसरी याचिका उच्चतम न्यायालय में लंबित है जिस पर अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।
पेशे से अधिवक्ता एवं याचिकाकर्ता अभिनव गौर ने इस कदम को संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन करने वाला असंवैधानिक कदम बताया है। यह अनुच्छेद सरकारी नौकरियों के मामले में समान अवसर उपलब्ध कराता है। याचिका में इस आधार पर एनबीईएमएस के निर्णय को चुनौती दी गई है कि नीट-पीजी 2025 के लिए कट-ऑफ अंकों में उल्लेखनीय कटौती से मेरिट के आधार पर चयन प्रक्रिया की शुचिता कमजोर होगी।
जनहित याचिका में कहा गया है कि दूसरे दौर की काउंसिलिंग के बाद 18,000 से अधिक सीटें खाली रहने पर बोर्ड ने योग्यता के मानक जबरदस्त ढंग से घटा दिए जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए अंक माइनस 40 तय किया गया। याचिकाकर्ता ने यह भी संकेत दिया कि सामान्य (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) वर्ग में कट ऑफ 276 से घटाकर 103 कर दिया गया, जबकि सामान्य (पीडब्लूबीडी) वर्ग में इसे 255 से घटाकर 90 कर दिया गया है। वहीं, एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग में इसे 235 से घटाकर माइनस 40 कर दिया गया जिससे जनस्वास्थ्य और मरीज की सुरक्षा बुरी तरह प्रभावित होगी।