Edited By Purnima Singh,Updated: 13 Mar, 2026 12:30 PM

जहां समकालीन सिनेमा अक्सर कल्पनाओं के रंगीन पर्दों के पीछे छिपता है, वहीं लवली फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड की फिल्म 'किस्सा कोर्ट कचहरी का' उस नग्न सत्य को उजागर करती है जिसे समाज अक्सर बंद दरवाजों के पीछे छोड़ आता है। यह फिल्म केवल एक अदालती ड्रामा...
UP Desk : जहां समकालीन सिनेमा अक्सर कल्पनाओं के रंगीन पर्दों के पीछे छिपता है, वहीं लवली फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड की फिल्म 'किस्सा कोर्ट कचहरी का' उस नग्न सत्य को उजागर करती है जिसे समाज अक्सर बंद दरवाजों के पीछे छोड़ आता है। यह फिल्म केवल एक अदालती ड्रामा नहीं, बल्कि एक व्यवस्थागत विसंगति पर कड़ा प्रहार है।
किस्सा कोर्ट कचहरी का
**** 4/5
फिल्म 'परिवर्तन की राजनीति' का आगाज
निर्माता अरुण कुमार ने इस फिल्म के जरिए यह साबित कर दिया है कि वे केवल फिल्में नहीं बनाते, बल्कि वे उन 'कहानियों के संरक्षक' हैं जिन्हें मुख्यधारा का सिनेमा भूल चुका है। एक ऐसे दौर में जहां मसालेदार फिल्में सुरक्षित निवेश मानी जाती हैं, अरुण कुमार ने एक जटिल और संजीदा विषय पर दांव लगाकर अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है। उनका यह कदम मनोरंजन उद्योग में 'परिवर्तन की राजनीति' का आगाज है, जहां व्यावसायिक सफलता से ऊपर 'सत्य की अभिव्यक्ति' को रखा गया है।
निर्देशक ने फिल्म को 'भावनात्मक महाकाव्य' की तरह बुना
निर्देशक रजनीश जायसवाल ने इस फिल्म को एक 'कानूनी दस्तावेज' के बजाय एक 'भावनात्मक महाकाव्य' की तरह बुना है। जायसवाल का नयापन इस बात में है कि उन्होंने कोर्टरूम को एक युद्धक्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रयोगशाला के रूप में दिखाया है जहां मानवीय धैर्य की परीक्षा होती है। उनका निर्देशन दर्शकों को केवल फिल्म नहीं दिखाता, बल्कि उन्हें उस घुटन और बेचैनी का हिस्सा बना देता है जिसे एक आम आदमी 'तारीख-दर-तारीख' महसूस करता है। उन्होंने सन्नाटे का इस्तेमाल एक संवाद की तरह करके निर्देशन की एक नई ऊंचाई को छुआ है।
दमदार अभिनय ने कहानी को दी गहराई
फिल्म की अभिनय शक्ति उस 'कलेक्टिव कनविक्शन' में निहित है, जहां राजेश शर्मा ने अपनी आँखों के ठहराव से न्याय की गरिमा को एक नया गुरुत्वाकर्षण दिया है, तो बृजेंद्र काला ने अपनी चिर-परिचित सादगी को एक ऐसी धार दी है जो व्यवस्था के खोखलेपन को बड़ी बेबाकी से उजागर करती है।
पारिवारिक दर्द और युवा संघर्ष की झलक
नीलू कोहली और सुशील चंद्रभान ने मिलकर उस पारिवारिक संताप और अडिग धैर्य का ताना-बाना बुना है जो फिल्म को भावनात्मक रूप से अभेद्य बनाता है, जबकि कृष्ण सिंह बिष्ट और अंजू जाधव ने युवा संघर्ष की उस तपिश को पर्दे पर उतारा है जो व्यवस्था के बंद दरवाजों को खटखटाने का साहस रखती है।
रॉ रियलिज्म ने कहानी को बनाया प्रभावशाली
संजीव जायसवाल और लोकेश तिलकधारी के किरदारों ने कहानी में वह 'रॉ रियलिज्म' भरा है जो दर्शकों को असहज करने के साथ-साथ सोचने पर मजबूर कर देता है। वहीं, नन्हीं अवन्या कुमारी की मासूमियत एक ऐसी मूक पुकार बनकर उभरती है जो न्याय की पूरी लड़ाई को एक रूहानी मकसद दे देती है।
तकनीकी टीम ने रचा प्रभावशाली माहौल
फिल्म का प्रभाव इसकी तकनीकी टीम के बिना अधूरा होता। धर्मेश बिस्वास (DOP) ने अपनी लाइटिंग और फ्रेमिंग से कोर्ट के उस 'अंधेरे और उजाले' के द्वंद्व को चित्रित किया है, जो न्याय मिलने की अनिश्चितता को दर्शाता है।
संगीत ने कहानी को दी भावनात्मक गहराई
संगीतकार प्रवेश मलिक ने अपने सुरों से फिल्म में एक ऐसी 'रूहानी टीस' पैदा की है, जो बैकग्राउंड स्कोर भर नहीं बल्कि कहानी का एक अदृश्य पात्र बनकर सामने आती है।
व्यवस्था पर तीखा सवाल उठाती फिल्म
'किस्सा कोर्ट कचहरी का' उस सिस्टम के गाल पर एक तमाचा है जहाँ 'न्याय' अक्सर 'कानून' की फाइलों में गुम हो जाता है। यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के लिए आत्ममंथन का एक जरिया भी बनती है।
‘किस्सा कोर्ट कचहरी का’ फिल्म रिव्यू
फिल्म किस्सा कोर्ट कचहरी का अपने दमदार विषय, प्रभावशाली निर्देशन और मजबूत अभिनय के कारण दर्शकों पर गहरा असर छोड़ती है। निर्देशक रजनीश जायसवाल ने कहानी को संवेदनशीलता और यथार्थ के साथ प्रस्तुत किया है, जबकि निर्माता अरुण कुमार ने एक ऐसे विषय पर फिल्म बनाकर साहसिक कदम उठाया है जो आमतौर पर मुख्यधारा के सिनेमा में कम देखने को मिलता है। फिल्म में राजेश शर्मा और बृजेंद्र काला समेत पूरी स्टार कास्ट ने अपने किरदारों को बेहद सजीव बनाया है। साथ ही तकनीकी पक्ष, सिनेमैटोग्राफी और संगीत भी कहानी के भाव को और गहराई देते हैं। सामाजिक मुद्दे को उठाते हुए यह फिल्म दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है।