ऐसा प्रावधान लैंगिक रूढ़िवादी विचारधारा को मजबूत करेगा- मासिक धर्म अवकाश पर नीति पर बोले CJI, याचिका पर सुनवाई से इनकार

Edited By Ramkesh,Updated: 13 Mar, 2026 03:38 PM

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उच्चतम न्यायालय ने छात्राओं एवं कामकाजी महिलाओं को मासिक धर्म अवकाश देने संबंधी राष्ट्रव्यापी नीति निर्माण का अनुरोध करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से शुक्रवार को इनकार करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में कोई महिलाओं को नौकरी नहीं देगा और ऐसा...

लखनऊ: उच्चतम न्यायालय ने छात्राओं एवं कामकाजी महिलाओं को मासिक धर्म अवकाश देने संबंधी राष्ट्रव्यापी नीति निर्माण का अनुरोध करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से शुक्रवार को इनकार करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में कोई महिलाओं को नौकरी नहीं देगा और ऐसा प्रावधान लैंगिक रूढ़ियों को अनजाने में और मजबूत करेगा।

नीति बनाने की संभावना की समीक्षा कर सकते हैं
शीर्ष अदालत ने हालांकि कहा कि सक्षम प्राधिकारी इस संबंध में दिए गए अभ्यावेदन पर विचार कर सकते हैं और सभी संबंधित पक्षों से परामर्श के बाद मासिक धर्म अवकाश पर नीति बनाने की संभावना की समीक्षा कर सकते हैं। न्यायालय ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अभ्यावेदन पर उचित निर्णय लें।

जनहित याचिका पर की सुनवाई
भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, ''ऐसी याचिकाएं डर पैदा करने के लिए दायर की जाती हैं, ये महिलाओं को हीन बताने के लिए, यह कहने के लिए दायर की जाती हैं कि मासिक धर्म उनके साथ होने वाली कोई बुरी चीज है.. लेकिन उस नियोक्ता के बारे में सोचिए, जिसे सवेतन अवकाश देना होगा।'' पीठ ने शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। 

ऐसी याचिकाएं महिलाओं के बारे में रूढ़ीवादी धारणा को मजबू करती हैं 
भारत के प्रधान न्यायाधीश ने मासिक धर्म अवकाश को कानून के जरिये अनिवार्य किए जाने के संभावित सामाजिक परिणामों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ऐसी याचिकाएं महिलाओं के बारे में रूढ़ीवादी धारणाओं को अनजाने में और मजबूत कर सकती हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एम आर शमशाद ने कहा कि कुछ राज्यों और संस्थानों ने मासिक धर्म अवकाश के अनुरूप पहले ही कदम उठाए हैं।

कानून बनाने पर उन्हें कोई नौकरी नहीं देगा
उन्होंने केरल का उदाहरण दिया, जहां विद्यालयों में इस संबंध में छूट दी गई है। उन्होंने कहा कि कई निजी कंपनियों ने भी कर्मचारियों को स्वेच्छा से इस प्रकार का अवकाश दिया है। भारत के प्रधान न्यायाधीश ने इस पर कहा कि स्वैच्छिक नीतियां स्वागतयोग्य हैं लेकिन उन्होंने ऐसे प्रावधानों को कानून के जरिये अनिवार्य बनाए जाने के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा, ''स्वेच्छा से अवकाश दिया जाना बहुत अच्छी बात है लेकिन जैसे ही आप कहेंगे कि यह कानून के तहत अनिवार्य है तो कोई उन्हें नौकरी नहीं देगा। 

महिलाओं का खत्म हो सकता है करियर
उन्हें न्यायपालिका या सरकारी नौकरियों में कोई नहीं लेगा; उनका करियर खत्म हो जाएगा।'' पीठ ने ऐसी व्यवस्थाओं के कार्यस्थल पर प्रभाव और महिलाओं की पेशेवर प्रगति पर पड़ने वाले संभावित असर को भी रेखांकित किया। पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर गौर करते हुए कहा कि याचिका दायर करने वाला व्यक्ति संबंधित प्राधिकारियों को पहले ही अभ्यावेदन दे चुका है। 
 

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