Edited By Anil Kapoor,Updated: 12 Mar, 2026 12:35 PM

Barabanki News: उत्तर प्रदेश के सरकारी महकमों में जालसाजी का एक हैरान कर देने वाला मामला अब अंजाम तक पहुंच गया है। बाराबंकी की सीजेएम कोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति को सजा सुनाई है, जो एक ही समय में दो अलग-अलग जिलों के दो अलग-अलग सरकारी विभागों में...
Barabanki News: उत्तर प्रदेश के सरकारी महकमों में जालसाजी का एक हैरान कर देने वाला मामला अब अंजाम तक पहुंच गया है। बाराबंकी की सीजेएम कोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति को सजा सुनाई है, जो एक ही समय में दो अलग-अलग जिलों के दो अलग-अलग सरकारी विभागों में नौकरी कर रहा था। आरोपी जयप्रकाश सिंह ने करीब डेढ़ दशक तक सरकार को चूना लगाया, लेकिन अंततः एक आरटीआई (RTI) ने इस डबल रोल का पर्दाफाश कर दिया।
1979 में पहली नौकरी, 1993 में दूसरी... और दोनों चालू!
आरोपी जयप्रकाश सिंह की चालाकी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह एक साथ स्वास्थ्य विभाग और शिक्षा विभाग का हिस्सा बना रहा। जयप्रकाश की पहली नियुक्ति 26 दिसंबर 1979 को प्रतापगढ़ जिले के स्वास्थ्य विभाग में नॉन-मेडिकल असिस्टेंट के पद पर हुई थी। इसी नौकरी के दौरान उसने जून 1993 में बाराबंकी के बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक (टीचर) के पद पर भी नियुक्ति हासिल कर ली। सबसे बड़ी बात यह थी कि दोनों नौकरियों के लिए उसने एक ही मार्कशीट और दस्तावेजों का इस्तेमाल किया और करीब 17 सालों तक दोनों जगहों से वेतन और भत्ते लेता रहा।
RTI की एक चोट और गिर गया झूठ का किला
यह काला खेल तब तक चलता रहा जब तक 2009 में शहर की आवास विकास कॉलोनी निवासी प्रभात सिंह ने इसकी शिकायत पुलिस में नहीं की। जब सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जानकारी निकाली गई, तो अधिकारियों के होश उड़ गए। रिकॉर्ड से साफ हो गया कि जयप्रकाश एक ही समय में दो जिलों में हाजिरी लगा रहा था और सरकारी खजाने को दोहरी चपत लगा रहा था।
कोर्ट का कड़ा फैसला- जेल, जुर्माना और वसूली
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सीजेएम (CJM) सुधा सिंह की अदालत ने आरोपी जयप्रकाश सिंह को दोषी पाया। अदालत ने इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है। आरोपी को सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है। 30 हजार रुपए का अर्थदंड लगाया गया है। सबसे बड़ी मार यह है कि कोर्ट ने 17 सालों तक लिए गए अवैध वेतन और भत्तों की सरकारी खजाने में वसूली का भी आदेश दिया है।
सिस्टम पर उठे सवाल
वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी अनार सिंह के मुताबिक, यह मामला उस दौर का है जब रिकॉर्ड डिजिटल नहीं थे, जिसका फायदा उठाकर आरोपी ने यह जाल बुना। हालांकि, आज के आधार और डिजिटल युग में ऐसी जालसाजी मुमकिन नहीं है, लेकिन इस मामले ने सरकारी निगरानी तंत्र की पुरानी कमियों को सरेआम उजागर कर दिया है।