बुलडोजर कार्रवाई पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद यूपी में जारी ध्वस्तीकरण पर उठाए सवाल

Edited By Ramkesh,Updated: 03 Feb, 2026 07:05 PM

allahabad high court takes a tough stand on bulldozer action questions ongoing

उत्तर प्रदेश में ध्वस्तीकरण कार्रवाई को गंभीरता से लेते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि उच्चतम न्यायालय के नवंबर, 2024 के 'बुलडोजर न्याय' को अस्वीकार्य बताने वाले निर्णय के बावजूद प्रदेश में ढांचों के खिलाफ दंडात्मक ध्वस्तीकरण जारी है। अदालत...

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में ध्वस्तीकरण कार्रवाई को गंभीरता से लेते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि उच्चतम न्यायालय के नवंबर, 2024 के 'बुलडोजर न्याय' को अस्वीकार्य बताने वाले निर्णय के बावजूद प्रदेश में ढांचों के खिलाफ दंडात्मक ध्वस्तीकरण जारी है। अदालत ने प्रदेश के हमीरपुर जिले में उस शख्स के रिश्तेदारों की याचिका पर यह टिप्पणी की है जिसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) एवं धर्मांतरण रोधी कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।

याचिका में वादियों की संपत्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई की आशंका जाहिर करते हुए अदालत से संरक्षण की गुहार लगाई गई है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने राज्य सरकार से सवाल किया कि क्या किसी अपराध के घटित होने के तुरंत बाद किसी संरचना को ध्वस्त करना, कार्यकारी विवेकाधिकार का एक दिखावटी प्रयोग है। अदालत ने कहा कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए हैं जिनमें अपराध घटित होने के तुरंत बाद संपत्ति के कब्जेदारों को ध्वस्तीकरण के नोटिस जारी किए गए और इसके बाद, वैधानिक आवश्यकताएं दिखावटी रूप से पूरी कर आवास स्थलों को ध्वस्त कर दिया गया। 

अदालत ने मामले की "व्यापक" प्रकृति को ध्यान में रखा है जिसमें किसी संरचना को ध्वस्त करने का राज्य का अधिकार और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उसमें रहने वाले लोगों के अधिकार शामिल हैं। अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए नौ फरवरी की अगली तारीख तय की। उच्च न्यायालय ने 21 जनवरी को पारित फैसले में कहा है कि दोनों पक्षों द्वारा प्रारंभिक दलीलें दी गई हैं और याचिकाकर्ताओं के मामले से यह प्रतीत होता है कि यद्यपि याचिकाकर्ता प्राथमिकी में सह-आरोपी नहीं है, फिर भी प्रतिवादी (प्रशासन) ने याचिकाकर्ता संख्या दो को प्राथमिकी दर्ज होने के तुरंत बाद उस आवासीय मकान को लेकर नोटिस जारी किया है जिसमें वे रहते हैं।

अदालत ने कहा कि वहीं, याचिकाकर्ता संख्या तीन के नाम दर्ज एक वाणिज्यिक संपत्ति "इंडियन लॉज" को प्रशासन द्वारा सील कर दिया गया और याचिकाकर्ता संख्या दो के नाम दर्ज एक आरा मिल के लाइसेंस का नवीकरण नहीं किया गया और इसे भी सील कर दिया गया। याचिका में याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई है कि उनकी संपत्तियां बुलडोजर की कार्रवाई के लिए चिन्हित की गई हैं, इसलिए इन्हें ध्वस्त होने से बचाने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की उच्च न्यायालय से गुहार लगाई गई। 

तथ्यों के मुताबिक, फैमुद्दीन और अन्य ने यह कहते हुए एक रिट याचिका दायर की है कि उनके रिश्तेदार (अफान खान) के खिलाफ बीएनएस, पॉक्सो अधिनियम, सूचना एवं प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यद्यपि उक्त प्राथमिकी में वे सह आरोपी नहीं हैं, फिर भी पुलिस की मिलीभगत से भीड़ ने उन्हें निशाना बनाया और हमीरपुर में स्थित उनकी संपत्तियां अधिकारियों द्वारा ढहाई जा सकती हैं। 

हालांकि, राज्य सरकार ने प्रारंभिक आपत्ति जताते हुए कहा कि यह याचिका समय से पूर्व ही दाखिल कर दी गई और याचिकाकर्ताओं को नोटिस का जवाब देना आवश्यक है। अदालत को मौखिक आश्वासन दिया गया कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बगैर कोई ध्वस्तीकरण नहीं किया जाएगा और याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाएगा। हालांकि, यह देखते हुए कि उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद राज्य में इस तरह के विध्वंस जारी हैं, पीठ ने 21 जनवरी को पारित आदेश में उठाए गए सवालों पर विचार करना उचित समझा।

 नवंबर 2024 में, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने टिप्पणी की थी कि बुलडोजर के माध्यम से न्याय करना किसी भी सभ्य न्याय प्रणाली में स्वीकार्य नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि राज्य को अवैध अतिक्रमणों या गैरकानूनी रूप से निर्मित संरचनाओं को हटाने के लिए कार्रवाई करने से पहले कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। 

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