संभल हिंसा केस: यूपी सरकार ने FIR आदेश को हाईकोर्ट में दी चुनौती, 22 पुलिस अफसरों में अनुज चौधरी भी शामिल

Edited By Anil Kapoor,Updated: 30 Jan, 2026 09:00 AM

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Sambhal News: उत्तर प्रदेश सरकार ने नवंबर 2024 में संभल में हुई हिंसा के दौरान कथित पुलिस फायरिंग के मामले में 22 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश को चुनौती देने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया......

Sambhal News: उत्तर प्रदेश सरकार ने नवंबर 2024 में संभल में हुई हिंसा के दौरान कथित पुलिस फायरिंग के मामले में 22 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश को चुनौती देने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस सूची में तत्कालीन संभल सिटी सर्किल ऑफिसर (सीओ) अनुज चौधरी भी शामिल हैं।

FIR दर्ज करने का आदेश और मामले का मूल कारण
9 जनवरी को संभल के तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) विभांशु सुधीर ने सीओ अनुज चौधरी, तत्कालीन कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर, और 20 अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया था। यह आदेश शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-आदेशित सर्वे के विरोध में हुई हिंसा के दौरान पुलिस फायरिंग के आरोपों को लेकर दायर शिकायत पर आधारित था

राज्य सरकार का रिवीजन पिटीशन
संभल के पुलिस अधीक्षक केके बिश्नोई ने पुष्टि की कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में रिवीजन पिटीशन दाखिल की है, जिसमें सीजेएम के FIR दर्ज करने के आदेश को रद्द करने की मांग की गई है। फिलहाल इस पिटीशन पर सुनवाई होना बाकी है।

शिकायतकर्ता के आरोप और पुलिस की सफाई
यह शिकायत संभल के खग्गू सराय निवासी मोहम्मद यामीन ने दायर की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि 24 नवंबर 2024 को उनका बेटा आलम जामा मस्जिद के पास ठेले पर बिस्किट बेच रहा था। इसी दौरान भीड़ पर पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें आलम को तीन गोलियां लगीं। हालांकि, एसपी बिश्नोई ने इन आरोपों को “बेबुनियाद” बताया और कहा कि पुलिस ने फायरिंग नहीं की थी। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता का बेटा हिंसा में आरोपी था।

हाईकोर्ट की कार्रवाई और प्रशासनिक फेरबदल
हाईकोर्ट ने हाल ही में आलम को अंतरिम अग्रिम जमानत दी है। FIR दर्ज करने का आदेश देने वाले सीजेएम विभांशु सुधीर को आदेश के एक सप्ताह बाद प्रशासनिक फेरबदल में सुल्तानपुर स्थानांतरित कर दिया गया। राज्य सरकार के अलावा, FIR में नामित अन्य पुलिस अधिकारियों ने भी अलग-अलग तरीके से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वहीं इस फैसले को राज्य में पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाए रखने वाला मामला माना जा रहा है, क्योंकि यह सवाल उठाता है कि पुलिस कार्रवाई के दौरान जिम्मेदारी और नागरिक सुरक्षा का संतुलन कैसे रखा जाए।

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