मौत से पहले विदाई! औरैया के बुजुर्ग ने जीते जी कर डाली अपनी तेरहवीं, 1900 लोगों को खिलाया अपनी कमाई का खाना

Edited By Anil Kapoor,Updated: 01 Apr, 2026 03:55 PM

elderly man from auraiya performed his thirteenth day rituals while he was alive

Auraiya News: उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में एक ऐसा वाकया सामने आया है जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। जहां एक 64 वर्षीय बुजुर्ग ने अपनी मौत का इंतजार करने के बजाय जीते जी अपनी तेरहवीं (मृत्यु भोज) का आयोजन कर डाला। रिश्तों से भरोसा उठने और...

Auraiya News: उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में एक ऐसा वाकया सामने आया है जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। जहां एक 64 वर्षीय बुजुर्ग ने अपनी मौत का इंतजार करने के बजाय जीते जी अपनी तेरहवीं (मृत्यु भोज) का आयोजन कर डाला। रिश्तों से भरोसा उठने और अकेलेपन के डर से उठाए गए इस कदम की चर्चा अब पूरे प्रदेश में हो रही है।

क्यों लिया यह अनोखा फैसला?
यह अजीबो-गरीब फैसला लेने वाले शख्स का नाम राकेश यादव है। राकेश के जीवन की कहानी काफी भावुक करने वाली है। उनके भाइयों की मृत्यु हो चुकी है और इकलौती बहन शादीशुदा है। परिवार में कोई और वारिस न होने के कारण राकेश को हमेशा यह चिंता सताती थी कि उनके मरने के बाद उनका अंतिम संस्कार और तेरहवीं की रस्म कौन निभाएगा? राकेश का कहना है कि उन्हें अपने रिश्तेदारों पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। उन्हें डर था कि उनकी मौत के बाद कोई उनकी जिम्मेदारी नहीं उठाएगा। इसी असुरक्षा की भावना ने उन्हें अपनी जिंदा तेरहवीं मनाने पर मजबूर कर दिया।

पेंशन और मेहनत की कमाई से खिलाया खाना
राकेश यादव ने इस भव्य भंडारे के लिए किसी से आर्थिक मदद नहीं मांगी। उन्होंने अपनी सालों की मेहनत-मजदूरी की बचत और मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन का एक-एक पैसा जोड़कर इस भोज का इंतजाम किया। इस आयोजन में पूरी तरह धार्मिक कर्मकांड के बजाय केवल सामूहिक भोज पर जोर दिया गया। मेहमानों के लिए पूड़ी, सब्जी और हलवे का विशेष प्रबंध किया गया था। राकेश ने अपना घर भी एक रिश्तेदार के नाम कर दिया है और अब खुद एक साधारण झोपड़ी में जीवन बसर कर रहे हैं।

1900 मेहमानों की जुटी भीड़, निमंत्रण पत्र भी बंटे
इस जिंदा तेरहवीं के लिए बाकायदा निमंत्रण पत्र छपवाकर बांटे गए थे। आयोजन के दिन करीब 1900 लोग इस अनोखी दावत का हिस्सा बनने पहुंचे। वहां मौजूद लोगों के लिए यह अनुभव मिला-जुला था; एक ओर जहां दावत का माहौल था, वहीं दूसरी ओर एक जीवित व्यक्ति द्वारा अपनी ही तेरहवीं का भोज देना सबको सन्न कर रहा था।

रिश्तों के टूटते भरोसे की कहानी
राकेश यादव का यह कदम समाज के लिए एक बड़ा सवाल है। उनका कहना है कि आज के दौर में जब अपने ही अपनों का साथ छोड़ रहे हैं, तो उन्होंने आत्मनिर्भर होकर अपनी अंतिम इच्छा खुद ही पूरी कर ली। फिलहाल, औरैया के इस जिंदा भंडारे की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहे हैं।

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