कानून अंतरधार्मिक विवाहों और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने पर रोक नहीं लगाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Edited By Pooja Gill,Updated: 24 Feb, 2026 08:48 AM

the law does not prohibit interfaith marriages and live in relations

प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 न तो अंतरधार्मिक विवाहों पर रोक लगाता है और न ही ऐसे जोड़ों को "लिव-इन रिलेशनशिप" में रहने...

प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 न तो अंतरधार्मिक विवाहों पर रोक लगाता है और न ही ऐसे जोड़ों को "लिव-इन रिलेशनशिप" में रहने से रोकता है। अदालत ने सोमवार को दिए गए फैसले में कहा कि न्यायालय ऐसे जोड़ों को हिंदू और मुस्लिम के रूप में नहीं देखता, बल्कि दो वयस्क व्यक्तियों के रूप में देखता है, जो अपनी स्वतंत्र इच्छा और पसंद से काफी समय से शांतिपूर्वक और खुशी से एक साथ रह रहे हैं। 

क्या है मामला? 
नूरी और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर कई रिट याचिकाओं और ग्यारह अन्य संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने दंपतियों को राहत दी कि वे अपनी शिकायतों के निवारण के लिए पुलिस अधिकारियों से संपर्क करने के लिए स्वतंत्र हैं। पीठ ने आदेश दिया "इस तरह के आवेदन प्राप्त होने पर, पुलिस अधिकारी याचिकाकर्ताओं की उम्र और उनके मामले की जांच करेंगे और यदि उन्हें याचिकाकर्ताओं के आरोपों में कोई सच्चाई मिलती है, तो वे याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई करेंगे।"        

'अपने मनचाहे व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार'
पीठ ने कहा, "अपने मनचाहे व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है। किसी व्यक्तिगत रिश्ते में हस्तक्षेप करना, दोनों व्यक्तियों की पसंद की स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन होगा। अदालत यह समझने में विफल रही है कि यदि कानून दो व्यक्तियों को, यहां तक ​​कि समान लिंग के व्यक्तियों को भी, शांतिपूर्वक एक साथ रहने की अनुमति देता है, तो न तो कोई व्यक्ति, न कोई परिवार और न ही कोई राज्य दो बालिग व्यक्तियों के विषमलिंगी संबंध पर आपत्ति कर सकता है, जो अपनी स्वतंत्र इच्छा से एक साथ रह रहे हैं।" 

'अंतरधार्मिक दंपतियों का लिव-इन रिलेशनशिप अपराध नहीं'
अदालत ने आगे टिप्पणी की, "अत: भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा उत्तर प्रदेश धर्म विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन अधिनियम, 2021 को ध्यान में रखते हुए, यह नहीं कहा जा सकता कि अंतरधार्मिक दंपतियों का लिव-इन रिलेशनशिप अपराध है।" पीठ के अनुसार अंतरधार्मिक विवाह भी अधिनियम 202 के तहत निषिद्ध नहीं है। अधिनियम 2021 के तहत भी प्रावधान किया गया है, जिसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपना धर्म बदलना चाहता है, तो उसे अधिनियम 2021 की धारा आठ और नौ में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। लेकिन किसी को भी विवाह या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।" 

'कानून सभी के लिए समान है'
अदालत ने कहा कि वह याचिकाकर्ताओं को हिंदू और मुस्लिम के रूप में नहीं, बल्कि दो वयस्क व्यक्तियों के रूप में देखती है जो अपनी स्वतंत्र इच्छा और पसंद से शांतिपूर्वक और खुशी से एक साथ रह रहे हैं। फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा, "याचिकाकर्ताओं का अंतरधार्मिक संबंध में रहना मात्र उन्हें भारत के नागरिक होने के नाते भारत के संविधान में निहित उनके मौलिक अधिकार से वंचित नहीं करता। जाति, पंथ, लिंग या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।" अदालत ने कहा कि चूंकि भारत के संविधान के अनुच्छेद-14 और 15 के अनुसार कानून सभी के लिए समान है, यदि एक ही धर्म के दो व्यक्ति लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं, तो अलग-अलग धर्मों के लोग भी लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं। 

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