Edited By Ramkesh,Updated: 19 Feb, 2026 02:00 PM

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 20 साल पुराने दुष्कर्म मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी की सजा आधी कर दी है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 7 साल 6 महीने की सजा को संशोधित करते हुए इसे दुष्कर्म के बजाय दुष्कर्म के प्रयास का मामला माना और...
यूपी डेस्क: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 20 साल पुराने दुष्कर्म मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी की सजा आधी कर दी है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 7 साल 6 महीने की सजा को संशोधित करते हुए इसे दुष्कर्म के बजाय दुष्कर्म के प्रयास का मामला माना और सजा घटाकर साढ़े तीन साल कर दी।
जानिए पूरा मामला
मामला 21 मई 2004 का है। धमतरी जिले की एक युवती ने आरोप लगाया था कि आरोपी उसे दुकान जाने के बहाने अपने घर ले गया, जहां उसके हाथ-पैर बांधकर और मुंह में कपड़ा ठूंसकर जबरन यौन उत्पीड़न किया। शिकायत के बाद मामला दर्ज हुआ और अप्रैल 2005 में धमतरी की अतिरिक्त सत्र अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(1) के तहत दोषी ठहराते हुए सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
दुष्कर्म साबित करने के लिए पेनिट्रेशन का प्रमाण आवश्यक
आरोपी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने 16 फरवरी 2026 को सुनाए गए निर्णय में कहा कि आरोपी की नीयत आपराधिक और स्पष्ट रूप से गलत थी, लेकिन उपलब्ध मेडिकल साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर पूर्ण पेनिट्रेशन साबित नहीं हो सका। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म साबित करने के लिए पेनिट्रेशन का प्रमाण आवश्यक है, केवल वीर्य स्राव या अन्य संकेत पर्याप्त नहीं हैं।
आंशिक पेनिट्रेशन की संभावना
सुनवाई के दौरान पीड़िता के बयान में कुछ विरोधाभास भी सामने आए। क्रॉस-एग्जामिनेशन में आंशिक पेनिट्रेशन की संभावना जताई गई, किंतु इसे निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सका। डॉक्टर की गवाही भी दुष्कर्म की पुष्टि करने में स्पष्ट नहीं थी।
सश्रम कैद की सजा बदली
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने सजा को धारा 376 से बदलकर धारा 376 सहपठित 511 (प्रयास) में परिवर्तित कर दिया। नई सजा के तहत आरोपी को साढ़े तीन साल की सश्रम कैद, 200 रुपये जुर्माना तथा धारा 342 के तहत 6 महीने की सजा सुनाई गई है। दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
साक्ष्यों और कानूनी मानकों के अनुसार निर्णय देता है अदालत
अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को बरी नहीं किया गया है, बल्कि अपराध की प्रकृति के अनुरूप धारा में संशोधन किया गया है। साथ ही कहा कि न्यायालय भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों और कानूनी मानकों के अनुसार निर्णय देता है।