Edited By Ramkesh,Updated: 13 Feb, 2026 08:00 PM

उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि व्यक्ति की जाति जन्म से निर्धारित होती है और न तो धर्म परिवर्तन से बदलती है, न ही विवाह से समाप्त होती है। अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला दूसरी जाति में विवाह करती है, तब भी...
प्रयागराज: उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि व्यक्ति की जाति जन्म से निर्धारित होती है और न तो धर्म परिवर्तन से बदलती है, न ही विवाह से समाप्त होती है। अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला दूसरी जाति में विवाह करती है, तब भी उसकी मूल जाति यथावत रहती है।
एससी/एसटी एक्ट को आरोपियों ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम ने दिनेश एवं अन्य की आपराधिक अपील को खारिज करते हुए की। अपील में अलीगढ़ स्थित एससी/एसटी एक्ट के विशेष न्यायाधीश द्वारा जारी सम्मन आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें आरोपियों को एससी/एसटी अधिनियम के तहत तलब किया गया था। मामले में शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने उसके साथ मारपीट की, अभद्र भाषा का प्रयोग किया और जातिसूचक शब्दों से उसका अपमान किया। इस घटना में शिकायतकर्ता समेत तीन लोग घायल हुए थे, जिनकी चिकित्सकीय जांच भी कराई गई थी।
एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्यवाही पर दिया सख्त आदेश
अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि शिकायतकर्ता मूल रूप से अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित जरूर है, लेकिन जाट समुदाय के व्यक्ति से विवाह करने के बाद उसकी जातिगत पहचान समाप्त हो गई है। इसलिए एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्यवाही अनुचित है। यह भी कहा गया कि महिला की शिकायत, आरोपियों द्वारा पहले दर्ज कराई गई एफआईआर के प्रतिशोध में की गई है।
राज्य सरकार तर्कों का कड़ा विरोध किया
राज्य सरकार ने इन तर्कों का कड़ा विरोध किया और कोर्ट को बताया कि दोनों पक्षों की शिकायतें एक ही दिन और लगभग समान समय की घटनाओं से जुड़ी हैं, इसलिए प्रतिशोध की दलील स्वीकार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता, गवाहों के बयान और मेडिकल साक्ष्यों पर विचार करने के बाद ही सम्मन आदेश जारी किया था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि क्रॉस-केस का होना किसी शिकायत को स्वतः खारिज करने का आधार नहीं हो सकता।
आरोपियों की दलील को हाईकोर्ट ने की खारिज
जाति परिवर्तन को लेकर की गई दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धर्म बदला जा सकता है, लेकिन जाति नहीं। विवाह से भी किसी व्यक्ति की जाति में कोई परिवर्तन नहीं होता। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने आरोपियों की आपराधिक अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।