Edited By Anil Kapoor,Updated: 19 Feb, 2026 02:28 PM
UP Politics News: 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में इन दिनों एक अलग ही ‘राजनीतिक योग’ चल रहा है… आसन वही पुराने हैं...बैठकें, समीक्षाएँ और रणनीतियां... लेकिन पार्टी का मंत्र बदल गया है... सूत्र बताते हैं कि सपा प्रमुख अखिलेश...
UP Politics News: 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में इन दिनों एक अलग ही ‘राजनीतिक योग’ चल रहा है… आसन वही पुराने हैं...बैठकें, समीक्षाएँ और रणनीतियां... लेकिन पार्टी का मंत्र बदल गया है... सूत्र बताते हैं कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव अब पार्टी के भीतर ‘चापलूसी डिटॉक्स’ मोड में हैं... यानी जो नेता अब तक पार्टी दफ्तरों की कुर्सियों और कैमरों के आसपास परिक्रमा करते दिखते थे अब उन्हें वो किनारे लगाने की तैयारी कर रहे हैं...
कहते हैं, सियासत में दो तरह के चेहरे होते हैं...एक वो जो जनता के बीच पसीना बहाते हैं, और दूसरे वो जो एसी हॉल में अपने नेताओं के पीछे अपना ‘कैमरा एंगल’ ढूंढते हैं…सपा में भी यही दो धाराएं अक्सर चर्चा में रहती हैं... पहली धारा के कार्यकर्ता गांव-गांव घूमकर जनता की समस्याओं को अपनी डायरी में नोट करते हैं... दूसरी धारा के कुछ नेता पार्टी दफ्तर में आकर कैमरे की फ्लैश में ‘जनसेवा का ग्लो’ तलाशते हैं... फर्क बस इतना कि एक धारा जनता के बीच पहचान बना रही है और दूसरी धारा पोस्टर और प्रोफाइल पिक्चर के भरोसे टिकट की तलाश में है…मगर अब पार्टी की रणनीति बदल रही है... पिछले दो चुनावों के अनुभवों ने अखिलेश यादव को सिखाया दिया है कि ‘सेल्फी रणनीति’ हमेशा सीटों में तब्दील नहीं होती... बूथ मैनेजमेंट की जगह अगर ‘फोटो मैनेजमेंट’ हावी हो जाए... तो नतीजे अक्सर ‘फ्रेम’ में अच्छे दिखते हैं...जमीन पर नहीं...और यही वजह है कि इस बार अखिलेश यादव अपनी पार्टी के भीतर नई कसौटी गढ़ रहे हैं...काम का रिपोर्ट कार्ड बनाम कैमरे का पोर्टफोलियो।
सूत्रों की मानें तो टिकट दावेदारी की दौड़ में अब वही आगे रहेंगे... जिनके जूतों की धूल असली होगी, न कि केवल दफ्तर की कारपेट-फ्रेंडली.... जिनके सोशल मीडिया पोस्ट से ज्यादा, इलाके की सड़कें और समस्याएँ बोलेंगी... यानी जो नेता जनता की आवाज बनते हैं, वही पार्टी की पसंद बनेंगे... ये बदलाव संगठनात्मक अनुशासन और जमीनी सक्रियता को केंद्र में रखने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है... सपा के गलियारों में भी अब चर्चा हो रही है कि... अब कैमरे से पहले कैडर की नजर पास करनी होगी... पार्टी कार्यकर्ताओं का एक वर्ग इसे ‘बेहतर सुधार’ मान रहा है... उनका तर्क है कि जब मेहनती कार्यकर्ताओं को तरजीह मिलेगी... तो कैडर का मनोबल भी बढ़ेगा और चुनावी मशीनरी में नई ऊर्जा आएगी।
हालांकि, राजनीति में हर बदलाव के साथ थोड़ी बेचैनी भी आती है...जिनकी दिनचर्या में दफ्तर-सेल्फी और मीटिंग-मोमेंट्स का ग्राफ ऊंचा था... वे अब ‘फील्ड विजिट’ के कैलेंडर अपडेट करते दिख सकते हैं... और जो पहले से जनता के बीच सक्रिय थे, उनके चेहरे पर संतोष की मुस्कान हो सकती है...ऐसे में अब देखना दिलचस्प होगा कि ये ‘नई हवा’ वोटों की दिशा में कितनी तेज़ी से बहती है।