आगरा में हैरान कर देने वाला मामला: 62 साल की महिला के पेट से निकला बालों का गुच्छा, 50 सालों से खाती रही खुद के बाल – डॉक्टर भी रह गए दंग

Edited By Anil Kapoor,Updated: 12 Oct, 2025 11:02 AM

agra news a clump of hair was found in the stomach of a 62 year old woman

Agra News: उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से एक बेहद चौंकाने वाला और अजीब मामला सामने आया है। जहां एक 62 साल की महिला को तेज पेट दर्द और लगातार उल्टियों की शिकायत हुई, जिसके बाद जब डॉक्टर्स ने जांच की तो सबके होश उड़ गए। महिला के पेट से बालों का एक बड़ा...

Agra News: उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से एक बेहद चौंकाने वाला और अजीब मामला सामने आया है। जहां एक 62 साल की महिला को तेज पेट दर्द और लगातार उल्टियों की शिकायत हुई, जिसके बाद जब डॉक्टर्स ने जांच की तो सबके होश उड़ गए। महिला के पेट से बालों का एक बड़ा गुच्छा निकला।

पेट दर्द की वजह निकली बालों की गाठ
महिला को नवदीप हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। पेट दर्द और उल्टियों के कारण जब जांच की गई, तो डॉक्टर्स को शक हुआ कि पेट में कुछ ठोस चीज अटक गई है। एंडोस्कोपी करने पर डॉक्टर्स को पता चला कि पेट में बालों का गुच्छा फंसा है, जो खाना पचने नहीं दे रहा था।

34 साल पहले भी हुआ था ऐसा ही ऑपरेशन
लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. सुनील शर्मा ने बताया कि यह केस काफी गंभीर था। महिला की काउंसलिंग की गई तो पता चला कि 34 साल पहले भी ऐसा ही ऑपरेशन इसी हॉस्पिटल में हुआ था, तब भी बालों का गुच्छा पेट से निकाला गया था। इस बार भी ऑपरेशन कर बालों को पेट से निकाला गया और अब महिला की हालत स्थिर है।

50 साल से खा रही थी अपने ही बाल
ऑपरेशन के बाद महिला ने डॉक्टर्स को बताया कि वह पिछले 50 साल से अपने ही सिर के बाल नोंच-नोंचकर खा रही है। यह आदत उसे बचपन में लग गई थी, जो धीरे-धीरे लत बन गई।

आखिर क्या है यह बीमारी?
डॉ. शर्मा के अनुसार, महिला को 'ट्राइकोटिलोमेनिया' नाम की मानसिक बीमारी है। इसमें व्यक्ति बार-बार अपने बाल तोड़ता है। जब ये टूटे हुए बाल वह खा लेता है, तो उसे 'ट्राइकोफेजिया' कहा जाता है। बाल पेट में पच नहीं पाते और धीरे-धीरे वहां जमा होकर बालों की गेंद (Hair Ball) बना देते हैं। इससे पाचन तंत्र बंद हो जाता है और खतरनाक स्थिति बन जाती है।

बच्चों और युवाओं में भी हो सकती है ये दिक्कत
डॉ. शर्मा ने बताया कि यह बीमारी सिर्फ बुजुर्गों में नहीं, बल्कि बच्चों और किशोरों में भी हो सकती है। अगर शुरुआत में ही पहचान हो जाए, तो काउंसलिंग और दवाओं की मदद से इसका इलाज किया जा सकता है।

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