Edited By Ramkesh,Updated: 01 Apr, 2026 03:38 PM

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि निजी संपत्ति के अधिकार के नाम पर सार्वजनिक व्यवस्था और शांति से समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत ने निजी जमीन पर बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा कर नमाज अदा करने पर रोक लगाने को सही ठहराया है।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि निजी संपत्ति के अधिकार के नाम पर सार्वजनिक व्यवस्था और शांति से समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत ने निजी जमीन पर बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा कर नमाज अदा करने पर रोक लगाने को सही ठहराया है।
तारिक खान की याचिका पर कोर्ट ने दिया आदेश
यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने बरेली निवासी तारिक खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने प्रशासन द्वारा रमजान के दौरान निजी संपत्ति पर नमाज पढ़ने से रोकने और शांति भंग की आशंका में किए गए चालान को चुनौती दी थी।
कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता सुरक्षा का हवाला देकर नियमों का दुरुपयोग कर रहा है। प्रस्तुत साक्ष्यों में यह सामने आया कि संबंधित संपत्ति पर रोजाना 50 से अधिक लोग नमाज के लिए एकत्र हो रहे थे, जिससे क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द प्रभावित होने का खतरा था। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है और किसी भी ऐसी गतिविधि को अनुमति नहीं दी जा सकती, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो।
जिला प्रशासन कार्रवाई के लिए स्वतंत्र
कोर्ट के कड़े रुख के बाद याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने आश्वासन दिया कि भविष्य में उक्त स्थान पर बड़ी संख्या में लोगों को एकत्र नहीं किया जाएगा। अदालत ने इस वचन को रिकॉर्ड पर लेते हुए कहा कि यदि इसका उल्लंघन होता है, तो जिला प्रशासन और पुलिस स्वतंत्र रूप से कड़ी कार्रवाई कर सकते हैं। हालांकि, अदालत ने मामले में संतुलित रुख अपनाते हुए 16 जनवरी 2026 को जारी चालानों को वापस लेने के निर्देश दिए और पूर्व में जारी अवमानना नोटिसों को भी निरस्त कर दिया। साथ ही एक अन्य संबंधित व्यक्ति को दी गई सुरक्षा वापस लेने का आदेश भी दिया गया। इन निर्देशों के साथ उच्च न्यायालय ने याचिका का निस्तारण कर दिया। यह फैसला निजी अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।