जिनके रक्त में था आजादी का जुनून...उनका नाम 'आजाद' और घर जेलखाना...

Edited By Tamanna Bhardwaj,Updated: 15 Aug, 2021 11:40 AM

chandrashekhar azad the real hero

पूरा देश आज आजादी की 75वीं जयंती मना रहा है। ऐसे में जब भी आज़ादी की लड़ाई की बात होती है, तो देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर देने वालों में चंद्रशेखर आज़ाद का नाम सबसे पहले लिया जाता है। चंद्रशेखर आज़ाद ने कम उम्र से ही वीरता के जौहर दिखाना शुरू कर दिया...

प्रयागराज: पूरा देश आज आजादी की 75वीं जयंती मना रहा है। ऐसे में जब भी आज़ादी की लड़ाई की बात होती है, तो देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर देने वालों में चंद्रशेखर आज़ाद का नाम सबसे पहले लिया जाता है। चंद्रशेखर आज़ाद ने कम उम्र से ही वीरता के जौहर दिखाना शुरू कर दिया था। आज़ाद एक ऐसे क्रन्तिकारी थे, जिन्होंने बहुत ही कम उम्र में 15 कोड़ों की सजा हुई। प्रयागराज में आज़ाद ने देश के लिए क़ुरबानी दी। आज़ाद के बहादुरी के चर्चे आज भी होते है, चाहे किसी भी धर्म के लोग हो अपने नाम के आगे या पीछे आज़ाद खासतौर पर जोड़े हुए है। क्रिकेट के शिखर धवन हो या फिर बॉलीवुड जगत के रणवीर सिंह सब आज़ाद की मूंछों के कायल है। आज भी प्रयागराज के म्यूजियम में उनकी पिस्टल रखी हुई है। स्वंत्रता दिवस के मौके पर चंद्रशेखर आज़ाद की जीवनी पर आधारित खास किस्से शेयर करने जा रहे हैं। 
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चंद्रशेखर आज़ाद एक ऐसे क्रांतिकारी जिसके आज भी हर उम्र के लोग उनकी शख्सियत के कायल है। प्रयागराज का चंद्रशेखर आज़ाद पार्क आज भी लोगों के लिए प्रेणा स्रोत बना हुआ है, क्योंकि आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे जिन्होंने 14 वर्ष की उम्र में ही 15 कोड़े खाने की सज़ा भुगत ली थी, लेकिन उनके साहस और निडर को देखते हुए अंग्रेज़ी हुकूमत इतनी परेशान हो गई कि उन्हें 16 कोड़े की सज़ा दी गई।
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17 साल की उम्र में चंद्रशेखर आज़ाद क्रांतिकारी दल ''हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ''में सम्मलित हो गए। पार्टी की ओर से धन एकत्र करने के लिए जितने भी कार्य हुए चंद्रशेखर उन सबमे आगे रहे। सेंट्रल असेंबली में भगत सिंह द्वारा बम फेंकना, वॉयसराय की ट्रेन बम से उड़ाने की कोशिश करने जैसी बहादुराना घटनाओं के अगवा वहीं थे। उन्होंने काकोरी कांड में सक्रिय भाग लिया था और पुलिस की आँखों में धूल झोंककर फरार हो गए थे।
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चन्द्रशेखर का जन्म मध्यप्रदेश के एक आदिवासी गांव भावरा में 23 जुलाई 1906 को हुआ था। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदर गांव के रहने वाले थे। अकाल पड़ने के कारण वो उन्नाव छोड़कर वो भावरा में जा बसे थे। चंद्रशेखर आज़ाद बचपन से ही साहसी थे, किसी चोट या आग में जलने से नहीं डरते थे। जब थोड़ा बड़े हुए तो वह अपने माता पिता को छोड़कर अध्यन के लिए बनारस पहुंच गए। वहां पर 'संस्कृति विद्यापीठ ' में भर्ती होकर संस्कृत का अध्यन करने लगे। 
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उन दिनों बनारस में असहयोग आंदोलन की लहर चल  रही थी। विदेशी सामान न बेचा जाए इसलिए लोग दुकानों के सामने लेट कर धरना देते थे। 1921 में बनारस में जब अंग्रेज़ों खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ तो कम उम्र वाले चंद्रशेखर ने भी वह नज़ारा देखा। अंग्रेज़ों ने उन्हें पकड़ लिया और अन्दोलनकरियों के बारे में बताने को कहा, उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया जहां पर उन्होंने बड़ी बहादुरी से सवालों का जवाब देकर खुद को राष्ट्रभक्त भारतवासी साबित कर दिया। उनसे पूछे गए सवाल और उनके जवाबो ने मजिस्ट्रेट को हिला दिया था। 

तुम्हारा नाम क्या है? 
मेरा नाम आज़ाद है।
तुम्हारा घर कहां हैं?
मेरा घर जेलखाना है। 

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इसपर उन्हें 15 कोड़े की सजा दी गई, जिसे उन्होंने मुस्कुराते हुए बर्दाश्त कर लिया और यही से उनके नाम के साथ आज़ाद जुड़ गया। आज़ाद ने धन की व्यवस्था के लिए अंग्रेज़ों का खज़ाना लूटने की योजना बनाई। उन्होंने 'काकोरी काण्ड' की नींव राखी। 9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने लखनऊ के निकट काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर- लखनऊ रेल गाडी को रोककर उसमे रखा खज़ाना लूट लिया। बाद में एक एक करके सभी क्रांतिकारी पकडे गए पर चंद्रशेखर आज़ाद कभी भी पुलिस के हाथ में नहीं आए। इतिहास के जानकारों के मुताबिक वो 27 फ़रवरी 1931 का दिन था। चंद्रशेखर आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार विमर्श कर रहे थे, जब पुलिस अधीक्षक 'नाटबाबर' ने अल्फ्रेड पार्क को घेर लिया। आज़ाद ने एक जामुन के पेड़ के आड़ लेकर दुसरे पेड़ की आड़ में छिप गए और उन्होंने नाटबाबर के ऊपर गोली दाग दी। इस बार का निशाना सही लगा और उनकी गोली ने नाटबाबर की कलाई तोड़ दी। आज़ाद ने जमकर अकेले ही पुलिस बल से मुकाबला किया उन्होंने अपने साथी सुखदेव को पहले ही भगा दिया था। उनके माउज़र में केवल एक ही गोली बची हुई थी। 
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उन्होंने सोचा की यदि में ये गोली भी चला दूंगा तो जीवित गिरफ्तार होने का भय है। अपनी कांपती में माउज़र की नाली लगाकर उन्होंने आखिरी गोली स्वय पर ही चला दी। इसी के साथ आज़ाद की वह शपथ भी पूरी हो गयी की वो जीते जी अंग्रेज़ो के हाथ नहीं आएंगे। इस तरह से 27 फ़रवरी 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद के रूप में देश का एक महान क्रन्तिकारी योद्धा देश की आज़ादी के लिए अपना बलिदान दे गया। जानकर ये भी बताते है कि चन्द्रशेखर आज़ाद फरारी काटने में माहिर थे, उनको इतनी समझ थी कि कब कहा कैसे और किसके साथ कितना वक्त बिताना है। साईकल चलाने के शौकीन आज़ाद हर वक़्त अकेले साइकिल चलना पसंद करते थे। प्रयागराज के चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में आज भी हर वर्ग के लोग दूर दूर से आते है और आज़ाद जी की प्रतिमा को नमन करते है।

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