Edited By Ramkesh,Updated: 01 Mar, 2026 06:21 PM

परम पूज्य संत रणछोड़ दास जी के कर कमलों द्वारा स्थापित सदगुरू सेवा संघ के ट्रस्टी एवं सदगुरू नेत्र चिकित्सालय के निदेशक पद्मश्री से अलंकृत लाखों लोगों के जीवन में उजला प्रदान करने वाले डॉ बी के जैन आज उसी चित्रकूट की तपोभूमि धरा पर पंचतत्व में विलीन...
चित्रकूट: परम पूज्य संत रणछोड़ दास जी के कर कमलों द्वारा स्थापित सदगुरू सेवा संघ के ट्रस्टी एवं सदगुरू नेत्र चिकित्सालय के निदेशक पद्मश्री से अलंकृत लाखों लोगों के जीवन में उजला प्रदान करने वाले डॉ बी के जैन आज उसी चित्रकूट की तपोभूमि धरा पर पंचतत्व में विलीन हो गए जिस तपोभूमि को उन्होंने अपना पूरा जीवन अर्पित किया था।

अंधकार में डूबी असंख्य आंखों को रोशनी देने वाला एक तपस्वी नेत्र चिकित्सक अब स्वयं अनंत ज्योति में विलीन हो गया। डॉ जैन की अंतिम यात्रा चिकित्सालय परिसर रघुवीर मंदिर होते हुए एसपीएस ग्राउंड में पहुंची जहां उनको तिरंगे के साथ गार्ड ऑफ सलामी दी गई।इस मौके पर जिलाधिकारी सतना पुलिस अधीक्षक सतना, पुलिस अधीक्षक चित्रकूट, विधायक सुरेंद्र सिंह गहरवार सहित तमाम जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक धर्म नगरी के सभी साधु संत, आम जनमानस सहित सदगुरु परिवार के लगभग सभी ट्रस्टीगण, गुरु भाई बहन, डॉ जैन के सभी परिवारिक जन ,रिश्तेदार सहित सदगुरु परिवार के सभी सदस्य उपस्थित रहे।उनके दोनों पुत्र जिनेश जैन एवं डॉ इलेश जैन ने उन्हें मुखाग्नि दी।

आपको बता दे कि 27 फरवरी 2026 को डॉ जैन का गंभीर बीमारी के चलते निधन हो गया था पिछले कई महीनों से अस्वस्थ्य थे और मुंबई में उनका इलाज चल रहा था।उनके मार्गदर्शन में चित्रकूट तपोभूमि पर तारा नेत्र दान यज्ञ के रूप में सेवा का जो बीज जो बोया गया था वह आज विशाल वटवृक्ष बन चुका है।उनके निधन से चित्रकूट सहित समूचे विंध्य अंचल में शोक की लहर दौड़ गई, संत समाज, समाज सेवी सेवी,जनप्रतिनिधि ,आम जनमानस सहित समस्त सदगुरू परिवार ने उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि के साथ अंतिम विदाई दी उनकी अंतिम विदाई में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।

सतना जिले में जन्मे डॉ जैन ने प्रारंभिक शिक्षा शासकीय व्यंकट क्रमांक -1 विद्यालय से प्राप्त की थी, वर्ष 1973 में श्याम शाह चिकित्सा महाविद्यालय ,रीवा से चिकित्सा स्नातक तथा 1979 में लोकमान्य तिलक चिकित्सा महाविद्यालय , सायन से नेत्र रोग में स्नाकोत्तर उपाधि प्राप्त की थी। स्नाकोत्तर के बाद उनके उज्ज्वल भविष्य का मार्ग खुला था मगर उन्होंने सुविधा नहीं बल्कि सेवा का मार्ग चुना और 1970 में चित्रकूट पहुंचे जहां स्वास्थ्य सुविधाएं अत्यंत सीमित थी।

परम पूज्य रणछोड़ दास जी महाराज के आशीर्वाद से शुरू तारा नेत्रदान यज्ञ ने चित्रकूट क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में नेत्र चिकित्सा की एक नई क्रांति ला दी थी।टेंट और टीन शेड के नीचे प्रारंभ हुए शिविर आज सुव्यवस्थित स्थापित किए गए लाखों नेत्र रोगियों के उपचार के माध्यम से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के तमाम जिलों को मोतियाबिंद मुक्त घोषित कराने में डॉ जैन ने महत्व महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चिकित्सा और अंधत्व निवारण के क्षेत्र में उनके अद्वतीय योगदान देने के लिए उनको देश विदेश में कई अवार्डों से सम्मानित किया गया और इसी अद्वतीय योगदान के लिए उन्हें 27 मई 2025 को देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मु ने उन्हें पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया था। उनकी अंतिम विदाई में बिलख उठे परिजन पत्नी ऊषा जैन, पुत्र जिनेश जैन,इलेश जैन, बहू श्रुति जैन, मौसम जैन, पौत्र पौत्री प्रियांश जैन, निर्वाण जैन, अर्णव जैन और अरिहा जैन समेत पूरा परिवार। वहां मौजूद हजारों लोग इस दृश्य को देखकर स्वयं को संभाल नहीं सके।उनकी अंतिम विदाई गार्ड ऑफ ऑनर में पुलिस ने शस्त्र झुकाएं।