Holika Dahan 2026: कब होगा होलिका दहन?...दूर करें कन्फ्यूजन, यहां जानें शुभ मुहूर्त

Edited By Pooja Gill,Updated: 28 Feb, 2026 02:12 PM

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Holi 2026: होली महापर्व की तिथि को लेकर प्रचलित भ्रम की स्थिति के बीच संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के ज्योतिषाचार्यों ने शास्त्रीय आधार पर अधिकृत निर्णय जारी किया है...

Holi 2026: होली महापर्व की तिथि को लेकर प्रचलित भ्रम की स्थिति के बीच संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के ज्योतिषाचार्यों ने शास्त्रीय आधार पर अधिकृत निर्णय जारी किया है। विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के सहायक आचार्य डॉ. मधुसूदन मिश्र ने बताया कि ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र विभाग ने फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा (संवत् 2082, ईस्वी 2026) के अवसर पर होलिका पर्व की तिथि और मुहूर्त पर विस्तृत मंथन के बाद निर्णय लिया है। यह निर्णय शास्त्र, ज्योतिषीय गणना और धर्मशास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर किया गया है। 

विश्वविद्यालय के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 को सायं 5:56 बजे से प्रारंभ होकर 3 मार्च को सायं 5:08 बजे तक रहेगी। 3 मार्च को सूर्योदय पूर्णिमा तिथि में ही होगा। शास्त्रों में फाल्गुनी पूर्णिमा पर भद्रा काल में होलिका दहन वर्जित बताया गया है। ‘निर्णयसिन्धु' एवं ‘धर्मसिन्धु' के अनुसार भद्रा के मुख भाग का त्याग कर निशीथोत्तर, अर्थात भद्रा पुच्छ काल में दहन करना श्रेयस्कर है।

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जानें शुभ मुहूर्त (Holi Subh muhrat)
स्थानीय पंचांग एवं शास्त्रीय गणना के आधार पर होलिका पूजन एवं दहन तीन मार्च (मंगलवार) को प्रात: 3:24 से 5:33 बजे तक (भद्रा पुच्छ एवं निशीथोत्तर काल) करना शास्त्रसम्मत माना गया है। उल्लेखनीय है कि 3 मार्च को सायंकाल चंद्रग्रहण होने के कारण प्रात: 9 बजे से सूतक प्रारंभ हो जाएगा। ग्रहण के दिन सायंकालीन उत्सव अथवा दहन शास्त्रानुकूल नहीं माना जाता। अत: होलिका भस्म धारण एवं धूलिवंदन (होली का मुख्य उत्सव) 4 मार्च 2026 (बुधवार) को प्रतिपदा तिथि में मनाना उचित होगा। 

श्रद्धालुओं से अपील...
विश्वविद्यालय ने होलिका पर्व के धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर भक्ति की विजय का प्रतीक है। साथ ही यह समरसता, बंधुत्व, वसंतागमन और अंत:करण की शुद्धि का संदेश देता है। विश्वविद्यालय ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे शास्त्रसम्मत मुहूर्त में पर्व मनाते हुए उसके आध्यात्मिक संदेश को अपनाएं और समाज में सछ्वाव एवं समरसता को बढ़ावा दें। 

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