Supreme Court का बड़ा फैसला- निजी अंग पकड़ना, पायजामे का नाड़ा खींचना रेप की कोशिश है

Edited By Radhika,Updated: 18 Feb, 2026 04:01 PM

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उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक विवादास्पद आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि निजी अंग पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना 'बलात्कार का प्रयास' है। उच्च न्यायालय ने अपने विवादित आदेश में कहा था कि निजी अंग पकड़ना और पायजामे का नाड़ा...

नेशनल डेस्क: उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक विवादास्पद आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि निजी अंग पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना ''बलात्कार का प्रयास'' है। उच्च न्यायालय ने अपने विवादित आदेश में कहा था कि निजी अंग पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना ''बलात्कार करने की केवल तैयारी'' हैं। भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची एवं न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने कहा कि विवादित आदेश को ''आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के स्पष्ट रूप से गलत प्रयोग'' के कारण रद्द किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने स्वत: संज्ञान लेकर दायर याचिका पर 10 फरवरी को यह आदेश पारित किया। न्यायालय ने याचिका में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस आदेश का संज्ञान लिया है कि केवल ''निजी अंग पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना बलात्कार के अपराध के बराबर नहीं'' है।

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उच्च न्यायालय के फैसले को शीर्ष अदालत ने रद्द कर दिया और मामले के दो आरोपियों के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) के तहत दर्ज बलात्कार के प्रयास के मूल कड़े आरोपों को बहाल कर दिया। पीठ ने कहा, ''हम उच्च न्यायालय के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हो सकते कि इस मामले में आरोप केवल तैयारी से संबंधित थे और वे बलात्कार करने का प्रयास का नहीं थे।'' उसने कहा, ''आरोपियों द्वारा किया गया प्रयास हमें स्पष्ट और अनिवार्य रूप से इस निष्कर्ष पर पहुंचाता है कि शिकायतकर्ता और अभियोजन पक्ष द्वारा बलात्कार के प्रयास से संबंधित प्रावधान लागू किए जाने का प्रथम दृष्टया मामला बनता है। विवादित निर्णय आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के स्पष्ट रूप से गलत प्रयोग के कारण रद्द किया जाना चाहिए।''

शीर्ष अदालत ने कहा कि इन आरोपों को सरसरी तौर पर देखने पर भी इस बात को लेकर ''रत्ती भर संदेह'' की गुंजाइश नहीं रहती कि जो मामला बनता दिख रहा है, वह यह है कि आरोपियों ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 (बलात्कार) के तहत अपराध करने के पूर्व निर्धारित इरादे से ये हरकतें कीं। पीठ ने कहा, ''17 मार्च, 2025 का विवादित फैसला रद्द किया जाता है और 23 जून, 2023 का वह मूल समन आदेश बहाल किया जाता है जो विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो), कासगंज ने पारित किया था।'' उसने साथ ही कहा, ''यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस न्यायालय ने इस फैसले में जो टिप्पणियां की हैं, वे केवल शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत मामले के प्रथम दृष्टया परिप्रेक्ष्य में की गई हैं और इन्हें आरोपियों की दोषसिद्धि को लेकर किसी प्रकार की राय नहीं समझा जाना चाहिए...।''

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 17 मार्च 2025 के आदेश में कहा था कि किसी लड़की के निजी अंग पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा खींचना बलात्कार का मामला नहीं है लेकिन यह किसी महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला करने या आपराधिक बल प्रयोग करने के दायरे में आता है। यह आदेश आरोपियों द्वारा दायर एक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा ने पारित किया था। आरोपियों ने कासगंज के विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती देते हुए यह पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। इस मामले के तथ्यों के मुताबिक, विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो अधिनियम) की अदालत में एक याचिका दाखिल करके आरोप लगाया गया था कि 10 नवंबर, 2021 को शाम करीब पांच बजे शिकायतकर्ता महिला अपनी 14 वर्षीय बेटी के साथ अपनी ननद के घर से लौट रही थी तभी उसके गांव के ही रहने वाले पवन, आकाश और अशोक रास्ते में उसे मिले और उन्होंने उससे पूछा कि वह कहां से आ रही है।

याचिका के अनुसार, जब महिला ने बताया कि वह अपनी ननद के घर से लौट रही है तो उन्होंने उसकी बेटी को मोटरसाइकिल से घर छोड़ने की बात कही जिसकी महिला ने इजाजत दे दी। इसमें आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने रास्ते में ही मोटरसाइकिल रोक दी और लड़की के निजी अंग पकड़ लिये। आरोप के अनुसार, आकाश ने लड़की को खींचकर एक पुलिया के नीचे ले जाने की कोशिश की और लड़की के पायजामे का नाड़ा खींच दिया। याचिका के अनुसार, लड़की की चीख पुकार सुन कर दो व्यक्ति वहां पहुंचे, जिसके बाद आरोपी मौके से भाग गए। 

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