इंसाफ या मजाक? ₹180 की जमीन के लिए लग गए 47 साल, 16 लाख फूंके तब जाकर मिला अपना ही हक

Edited By Anil Kapoor,Updated: 13 Apr, 2026 02:23 PM

lucknow news fought a lawsuit for 47 years over land worth 180

Lucknow News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से न्याय प्रणाली की सुस्ती और संघर्ष की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हैरान कर देने वाली है। गोसाईंगंज के एक किसान परिवार को अपनी महज 180 रुपए में खरीदी गई जमीन वापस पाने के लिए जीवन के 47 साल अदालत के...

Lucknow News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से न्याय प्रणाली की सुस्ती और संघर्ष की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हैरान कर देने वाली है। गोसाईंगंज के एक किसान परिवार को अपनी महज 180 रुपए में खरीदी गई जमीन वापस पाने के लिए जीवन के 47 साल अदालत के चक्कर काटने में गुजारने पड़े। अंततः दिसंबर 2025 में फैसला उनके पक्ष में आया और अब जाकर उन्हें जमीन पर कब्जा मिल सका है।

धोखाधड़ी की वो कहानी जिसने बदली जिंदगी
यह मामला बस्तिया गांव का है। जहां के निवासी ब्रजेश वर्मा ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय रामसागर ने साल 1965 में करीब पौने दो बिस्वा जमीन मात्र 180 रुपए में खरीदी थी। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन साल 1973 में इस जमीन पर कब्जा करने की नीयत से एक बड़ी साजिश रची गई। आरोप है कि जमीन की सह-खरीदार शिवरानी ने धोखाधड़ी करते हुए रामसागर की जगह किसी अन्य व्यक्ति को खड़ा कर दिया और फर्जी तरीके से रजिस्ट्री अपने नाम करा ली। इस जालसाजी का पता काफी समय बाद चला, जब एक गवाह ने विवाद के बाद इस राज से पर्दा उठाया।

अदालत की दहलीज पर बीतीं दो पीढ़ियां
रामसागर ने हार नहीं मानी और साल 1978 में गोसाईंगंज थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। इसके बाद शुरू हुआ तारीखों का अंतहीन सिलसिला। कानूनी लड़ाई के दौरान 2003 में वादी रामसागर का निधन हो गया। दूसरी तरफ, 2013 में प्रतिवादी शिवरानी की भी मौत हो गई। दोनों पक्षों के वारिसों ने इस मुकदमे को जारी रखा और आखिरकार दिसंबर 2025 में अदालत ने फर्जी रजिस्ट्री को रद्द कर ब्रजेश वर्मा के हक में फैसला सुनाया।

180 रुपए बनाम 16 लाख का खर्च
इस केस की सबसे दुखद और चौंकाने वाली बात इसका खर्च है। ब्रजेश वर्मा के अनुसार, जिस जमीन की मूल कीमत केवल 180 रुपए थी, उसे साबित करने और वापस पाने के लिए उनके परिवार ने वकीलों और अदालती कार्रवाई में करीब 16 लाख रुपए खर्च कर दिए। फैसला आने के बाद भी कब्जा मिलने में 3 महीने का अतिरिक्त समय लगा।

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