Edited By Anil Kapoor,Updated: 26 Mar, 2026 02:45 PM

Moradabad News: उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले से सांप्रदायिक सौहार्द की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने समाज में गिरते मानवीय मूल्यों के बीच उम्मीद की नई किरण जगाई है। जहां 76 वर्षीय बुजुर्ग तेजपाल सिंह के निधन के बाद जब उनके अपनों ने मुख मोड़...
Moradabad News: उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले से सांप्रदायिक सौहार्द की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने समाज में गिरते मानवीय मूल्यों के बीच उम्मीद की नई किरण जगाई है। जहां 76 वर्षीय बुजुर्ग तेजपाल सिंह के निधन के बाद जब उनके अपनों ने मुख मोड़ लिया, तो मुस्लिम पड़ोसियों और स्थानीय हिंदू युवाओं ने मिलकर उनका अंतिम संस्कार किया।
15 साल पहले शुरू हुआ था अपनों से बढ़कर का रिश्ता
मूल रूप से बिजनौर के रहने वाले तेजपाल सिंह कभी पेपर मिल में इलेक्ट्रिशियन थे। 1997 में एक हादसे ने उन्हें दिव्यांग बना दिया और यहीं से उनके दुखों का सिलसिला शुरू हुआ। पारिवारिक कलह के चलते पत्नी और इकलौती बेटी से उनके संबंध टूट गए। साल 2011 में तेजपाल ने अपना घर आसिफ नाम के व्यक्ति को बेच दिया था। घर बेचने के बाद वे कुछ समय बाहर रहे, लेकिन यादें उन्हें वापस उसी चौखट पर खींच लाईं। तेजपाल की इच्छा का सम्मान करते हुए आसिफ ने ना केवल उन्हें अपने घर में रहने की जगह दी, बल्कि पिछले 15 वर्षों से उनका ख्याल भी रखा। आसिफ का 10 वर्षीय बेटा अमान रोज उनके लिए खाना लेकर जाता था।
जब सगे संबंधियों ने फेर ली नजरें
तेजपाल सिंह के देहांत के बाद पुलिस ने उनकी पूर्व पत्नी और बिजनौर स्थित पैतृक गांव में सूचना दी। लेकिन, पत्नी ने पुराने तलाक का हवाला देते हुए आने से साफ इनकार कर दिया। जब कोई अपना आगे नहीं आया, तो आसिफ का परिवार और अगवानपुर के मुस्लिम भाई ढाल बनकर खड़े हो गए।
मुस्लिमों ने जुटाया चंदा, हिंदू रीति-रिवाज से दी विदाई
स्थानीय मुस्लिम भाइयों ने आपसी चंदा इकट्ठा कर अंतिम संस्कार की सामग्री जुटाई। उन्होंने ना केवल अर्थी को कंधा दिया, बल्कि पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ अंतिम यात्रा निकाली। श्मशान घाट की उचित व्यवस्था ना होने के बावजूद, रामगंगा किनारे मोनू नामक युवक ने उन्हें मुखाग्नि दी।
श्मशान घाट की समस्या ने बढ़ाई नाराजगी
इस भावुक विदाई के बीच प्रशासन की एक बड़ी लापरवाही भी उजागर हुई। स्थानीय निवासियों और रामलीला कमेटी ने रोष व्यक्त किया कि अगवानपुर में हिंदू समाज के लिए कोई व्यवस्थित श्मशान घाट नहीं है। लोगों को उबड़-खाबड़ जमीन और गड्ढों के बीच अंतिम क्रिया करनी पड़ी। आरोप है कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे हैं, लेकिन श्मशान के लिए जगह आवंटित नहीं की जा रही, जिससे कई बार बजट वापस लौट गया।