यदि कोई लड़का आरोप लगा रहा था तो पुलिस ने पहले क्यों नहीं दर्ज किया मुकदमा: अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती

Edited By Pooja Gill,Updated: 24 Feb, 2026 03:15 PM

if a boy was making the allegations why did the police not register a case

वाराणसी: ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी नाबालिग ने आरोप लगाया था तो पुलिस ने पहले पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा...

वाराणसी: ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी नाबालिग ने आरोप लगाया था तो पुलिस ने पहले पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज क्यों नहीं किया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि एक पुलिस अधिकारी की तस्वीरें एक हिस्ट्रीशीटर के साथ जश्न मनाते हुए सामने आई हैं। 

'संगम नोज पर रोकने के बाद हुआ मुकदमा'
अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि 18 फरवरी को मौनी अमावस्या के दिन उन्हें संगम नोज पर रोका गया था। उसी दिन शाम को एक तथाकथित महाराज ने उनके खिलाफ मुकदमा दायर किया और आरोप लगाया कि उनके शिष्य मुकुंदानंद ने उन्हें पटककर गला दबाया। उन्होंने कहा कि मौनी अमावस्या जैसे पर्व पर, जब भारी भीड़ होती है, ऐसे गंभीर आरोप लगाना संदेह पैदा करता है। दूसरा आरोप यह लगाया गया कि उन्होंने पालकी से कोई वजनदार वस्तु फेंकी, जिससे बड़ी घटना हो सकती थी। 

अविमुक्तेश्वरानंद स्वामी ने उठाए सवाल 
अविमुक्तेश्वरानंद स्वामी ने कहा कि वे दिनभर मीडिया कैमरों के सामने मौजूद थे और कोई साक्ष्य नहीं मिलने के कारण पुलिस ने प्रारंभ में मामला दर्ज नहीं किया। बाद में नया मामला यौन उत्पीड़न का सामने लाया गया। उन्होंने प्रश्न उठाया कि यदि कोई लड़का आरोप लगा रहा था तो उसी दिन पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर मेडिकल परीक्षण क्यों नहीं कराया गया। उनका कहना था कि अदालत के आदेश के बाद ही प्राथमिकी दर्ज की गई।

अजय राय ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र 
उधर, अजय राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ दर्ज मामले की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि जांच किसी स्वतंत्र या केंद्रीय एजेंसी से कराई जानी चाहिए। अजय राय ने पत्र में लिखा कि यदि किसी शीर्ष धर्माचार्य के विरुद्ध ऐसी परिस्थितियां बनती हैं, जिससे शासन और आध्यात्मिक परंपरा के बीच टकराव की धारणा बने, तो व्यापक धार्मिक समाज में असंतोष उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने कहा कि यह विषय केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि आस्था, संवैधानिक अधिकार और शासन की निष्पक्षता से जुड़ा हुआ है। 
 

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