याद किये गये राष्ट्रगान के रचयिता टैगोर

Edited By Ramkesh,Updated: 07 Aug, 2020 12:42 PM

tagore the author of the remembered national anthem

राष्ट्रगान ‘जन गण मन'' और बांग्लादेश के राष्ट्रगान‘आमार सोनार बांग्ला''के रचयिता एवं नोबेल पुरस्कार विजेता विश्व भारती विश्व विद्यालय के संस्थापक गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की 79 वीं पुण्यतिथि समूचे उत्तर प्रदेश में सोशल डिस्टेसिंग का पालन करते हुये...

जौनपुर: राष्ट्रगान ‘जन गण मन' और बांग्लादेश के राष्ट्रगान‘आमार सोनार बांग्ला'के रचयिता एवं नोबेल पुरस्कार विजेता विश्व भारती विश्व विद्यालय के संस्थापक गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की 79 वीं पुण्यतिथि समूचे उत्तर प्रदेश में सोशल डिस्टेसिंग का पालन करते हुये मनायी गयी। जौनपुर के सरगंवा गांव में स्थित शहीद स्मारक पर लोगो को संबोधित करते हुए लक्ष्मीबाई ब्रिगेड की अध्यक्ष मंजीत कौर ने कहा कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का जन्म सात मई 1861को तत्कालीन कलकत्ता व वर्तमान में कोलकाता में हुआ था । उन्होंने कहा कि नोबेल पुरस्कार विजेता श्री टैगोर ने भारत के राष्ट्रगान की रचना की ,वहीं शांति निकेतन में विश्व भारती विश्व विद्यालय की स्थापना कर शिक्षा को बढ़ावा दिया । उन्होंने कहा कि शांति निकेतन का मानवता सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

उन्होंने कहा कि गुरुदेव का कहना था कि शिक्षा से ज्ञान बढेगा और लोग विवेकवान होंगे ,मगर आज दु:ख इस बात का है कि आज की शिक्षा ऐसी हो गयी है कि उसका वर्णन करना बहुत मुश्किल ही नही , कठिन भी है ।कहा कि गुरुदेव श्री टैगोर महान लेखक , विचारक , स्वतंत्रता सेनानी और बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व वाले महापुरुष थे , उन्होंने अपनी लेखनी से देश व समाज को बहुत कुछ दिया है ।

आजादी की लड़ाई के दौरान गुरुदेव ने दो गीत चित्तो जेठा भयशून्यों ( मन डर के बिना ) और एकला चलो रे ( अकेले चलो ) बहुत प्रचलित हुए । देशवासी ही नही ,अंग्रेज सरकार भी उनका बहुत सम्मान करतीं थी , लेकिन श्री टैगोर ने अंग्रेज सरकार द्वारा दी गयी नाईट की पदवी को जलियावाला बाग नरसंहार के विरोध में लौटा दिया था । सुश्री कौर ने कहा कि गुरुदेव को पहला नोबेल पुरस्कार 1913 में उनकी पुस्तक गीतांजलि की रचना के लिए मिला था । सब कुछ करते और देश व समाज को देखते हुए सात अगस्त 1941 को गुरुदेव इस संसार से हमेशा के लिए चले तो गए , मगर उनकी कृतियां व कर्म उन्हें आज भी जीवित किये हुए हैं ।

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