सड़क किनारे भूखे शख्स को देख पसीजा दिल, परिवार ने लिया हर रविवार भोजन सेवा का संकल्प

Edited By Ramkesh,Updated: 23 Feb, 2026 06:06 PM

seeing a hungry man on the roadside moved their hearts the family resolved to s

जहां आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपने लिए वक्त नहीं निकाल पाते, वहीं प्रयागराज का तिवारी परिवार पिछले कई वर्षों से हर रविवार को असहाय और जरूरतमंद लोगों के लिए उम्मीद की रोशनी बनकर सामने आ रहा है। करीब साढ़े तीन साल पहले एक ऐसी घटना ने इस परिवार...

प्रयागराज (सैय्यद आकिब रजा): जहां आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपने लिए वक्त नहीं निकाल पाते, वहीं प्रयागराज का तिवारी परिवार पिछले कई वर्षों से हर रविवार को असहाय और जरूरतमंद लोगों के लिए उम्मीद की रोशनी बनकर सामने आ रहा है। करीब साढ़े तीन साल पहले एक ऐसी घटना ने इस परिवार की जिंदगी की दिशा बदल दी। सड़क किनारे एक गरीब व्यक्ति जमीन पर गिरा भोजन उठाकर खाने लगा तो पूरा परिवार भावुक हो गया। उसी क्षण यह संकल्प लिया गया कि अब हर रविवार जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाया जाएगा।

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प्रयागराज के झूसी क्षेत्र के रहने वाले मंगला प्रसाद तिवारी ,उनकी पत्नी, बच्चे और पिताजी ने बड़ी जिम्मेदारी उठाई है। घर के बड़े-बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक इस सेवा में शामिल हो गए। सब्जी काटने से लेकर रोटियां बनाने और पैकिंग तक, हर काम में परिवार के हाथ एक साथ जुड़ गए। रविवार दोपहर होते-होते भोजन के पैकेट तैयार हो जाते हैं। फिर परिवार के सदस्य शहर की सड़कों, फुटपाथों और झुग्गी बस्तियों में जाकर जरूरतमंदों को सम्मानपूर्वक भोजन वितरित करते हैं। 

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ये तस्वीर सिर्फ भूख की नहीं, बल्कि समाज की संवेदनहीनता की भी है। सड़क किनारे गिरे खाने को समेटकर पेट भरने की कोशिश करता एक लाचार इंसान… और उसी वक्त वहां से गुजर रहा एक परिवार। दृश्य इतना मार्मिक था कि पूरा परिवार भीतर तक हिल गया। किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन सबने महसूस किया कि अब सिर्फ अफसोस काफी नहीं। उसी दिन तय हुआ अब हर रविवार जरूरतमंदों को भोजन कराया जाएगा। अगले ही हफ्ते से घर की रसोई सेवा का केंद्र बन गई। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं — सभी ने जिम्मेदारी संभाली। खाना बनता है, पैक होता है और फिर सड़कों व झुग्गियों तक पहुंचाया जाता है।

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अब यह सेवा एक परंपरा बन चुकी है। हर रविवार मानवता का उत्सव बन जाता है। जरूरतमंदों के चेहरे की मुस्कान इस परिवार के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। समय के साथ यह पहल एक परंपरा बन गई। अब यह सिर्फ भोजन वितरण नहीं, बल्कि संवेदना और जिम्मेदारी का प्रतीक है। परिवार का मानना है कि समाज में बदलाव बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कार्यों से आता है। अगर हर घर सप्ताह में एक दिन भी जरूरतमंदों के लिए समर्पित कर दे, तो कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोएगा।

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