विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सरधना विधानसभा सीट को लेकर भाजपा में खीचतान, बनाई ये रणनीति

Edited By Pooja Gill,Updated: 04 Apr, 2026 03:05 PM

ahead of the 2027 assembly elections the bjp is sparring over the sardhana

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ही सियासी दलों ने अपनी रणनीति के तहत बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति....

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ही सियासी दलों ने अपनी रणनीति के तहत बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक दिलचस्प घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर मेरठ की सरधना सीट पर अपनी दावेदारी ठोककर भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। यह कवायद ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के दो प्रभावशाली नेताओं पूर्व सरधना विधायक संगीत सोम और पूर्व मुजफ्फरनगर सांसद संजीव बालियान के बीच तनातनी लगातार बढ़ती जा रही है।

क्यों शुरू हुआ था विवाद 
दरअसल, 2022 के विधानसभा चुनाव में सरधना सीट से सोम की हार के बाद यह विवाद शुरू हुआ था। ठाकुर समुदाय से आने वाले सोम ने जाट नेता बालियान पर आरोप लगाया था कि उन्होंने चुनाव के दौरान उनके पक्ष में जाट वोटों का ध्रुवीकरण नहीं कराया। उस चुनाव में सोम को समाजवादी पाटर्ी के अतुल प्रधान ने हराया था, जो गुर्जर समुदाय से आते हैं। इसके जवाब में बालियान ने भी पलटवार करते हुए सोम पर हरेंद्र मलिक की मदद करने का आरोप लगाया। मलिक ने 2024 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर सीट से बालियान को शिकस्त दी थी। सरधना विधानसभा क्षेत्र इसी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है।        

2022 में भाजपा हार गई थी ये तीनों सीटें
हाल ही में सरधना में 18वीं सदी के जाट शासक महाराजा सूरजमल की प्रतिमा के अनावरण के दौरान बालियान के बयान ने इस विवाद को और हवा दे दी। उन्होंने 2024 की हार को ‘अपमान' बताते हुए ‘ब्याज समेत बदला' लेने की बात कही थी। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन सियासी हलकों में इसे सोम पर निशाना माना गया था। इसी पृष्ठभूमि में रालोद ने मेरठ की कम से कम तीन सीटों सरधना, सिवालखास और किठौर को लेकर भाजपा से बातचीत शुरू की है। गौरतलब है कि 2022 में ये तीनों सीटें भाजपा हार गई थी। उस समय रालोद समाजवादी पार्टी की सहयोगी थी और सिवालखास सीट रालोद के खाते में गई थी, जबकि किठौर से सपा उम्मीदवार विजयी रहे थे। 

'रालोद को सरधना में उतारना भाजपा के लिए ‘सेफ एग्जिट' रणनीति हो सकती 
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरधना सीट रालोद को देने से भाजपा को सोम और बालियान के बीच चल रही खींचतान को संतुलित करने का रास्ता मिल सकता है। रालोद के लिए भी सरधना सीट खास महत्व रखती है, क्योंकि यह जाट बहुल क्षेत्र के केंद्र में स्थित है। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले राजग में शामिल होने के बाद रालोद के सामने अपने पारंपरिक जाट वोट बैंक को बनाए रखने के साथ-साथ गठबंधन धर्म निभाने की चुनौती है। ऐसे में सरधना समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीटों पर रालोद की सक्रियता इस बात का संकेत है कि पार्टी न सिर्फ अपनी खोई जमीन वापस पाना चाहती है, बल्कि एनडीए के भीतर अपनी राजनीतिक भूमिका को भी मजबूत करने की कोशिश में है। पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता के अनुसार, 'रालोद को सरधना में उतारना भाजपा के लिए एक ‘सेफ एग्जिट' रणनीति हो सकती है, जिससे दोनों नेताओं के बीच टकराव कम किया जा सके।' 

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