Edited By Anil Kapoor,Updated: 08 Jul, 2026 01:58 PM

उत्तर प्रदेश में अमरोहा जिले की हसनपुर तहसील में नियमों को ताक पर रखकर चरागाह, नदी, झील और तालाबों की करीब 2880 बीघा बेशकीमती सार्वजनिक भूमि पर 500 से अधिक अवैध पट्टे जारी करने का एक बड़ा मामला सामने आया है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि....
Amroha News: उत्तर प्रदेश में अमरोहा जिले की हसनपुर तहसील में नियमों को ताक पर रखकर चरागाह, नदी, झील और तालाबों की करीब 2880 बीघा बेशकीमती सार्वजनिक भूमि पर 500 से अधिक अवैध पट्टे जारी करने का एक बड़ा मामला सामने आया है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि भू-माफिया और तत्कालीन राजस्व कर्मियों की मिलीभगत से वर्ष 1987 से 2000 के बीच अंजाम दिए गए इस खेल का खुलासा वर्ष 2024 में शुरू हुई चकबंदी प्रक्रिया के दौरान हुआ, जिससे राजस्व महकमे में हड़कंप मचा हुआ है।मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 2 गांवों के पट्टे निरस्त कर भूमि को दोबारा मूल स्वरूप में दर्ज कर लिया है, जबकि शेष मामलों की सुनवाई जारी है।
हसनपुर के 4 गांवों में फैला खेल
सूत्रों ने बताया कि यह पूरा मामला हसनपुर तहसील के 4 गांवों गंगेश्वरी (1100 बीघा), रहरा (1200 बीघा), आदमपुर (500 बीघा) और दढ़ियाल (80 बीघा) से जुड़ा है। जिला शासकीय अधिवक्ता ने बताया है कि प्रकरण में चकबंदी विभाग की रिपोर्ट के बाद जिलाधिकारी के निर्देश पर अपर जिला अधिकारी (ADM) न्यायिक की अदालत द्वारा पट्टा निरस्तीकरण की प्रक्रिया अमल में लाई गई। इसके तहत अब तक गंगेश्वरी और दढ़ियाल गांवों के अवैध पट्टे खारिज किए जा चुके हैं, जिनमें 7 महीने पहले दढ़ियाल के 29 पट्टे भी शामिल हैं। वहीं, रहरा और आदमपुर के मामलों की अदालती सुनवाई अभी जारी है। इसके अतिरिक्त, जिले के मंडी धनौरा क्षेत्र और गंगा नदी खादर व डूब क्षेत्र समेत वन विभाग की जमीनों पर भी अवैध कब्जों की शिकायतें लंबित चल रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश
जिला शासकीय अधिवक्ता (राजस्व) राजेश कुमार राणा ने बताया कि जमींदारी एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 तथा वर्तमान राजस्व संहिता की धारा 77 के तहत सार्वजनिक उपयोग, जलीय स्रोतों या चरागाह की भूमि का निजी आवंटन पूरी तरह प्रतिबंधित है। वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने भी पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए ऐसी जमीनों को उनके मूल स्वरूप में बहाल करने के कड़े निर्देश दिए थे, जिसके तहत ही यह निरस्तीकरण की कार्रवाई की जा रही है। बताया गया कि मामले की गड़बड़ी के लिए केवल पट्टाधारक ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि वास्तविक प्रकृति की जानकारी होने के बावजूद अभिलेखों को बदलने वाले तत्कालीन लेखपाल, राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार और एसडीएम की जवाबदेही बनती है।
जांच के दायरे में आएंगे पुराने अफसर
आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि यह एक न्यायिक प्रक्रिया है और वर्ष 1987 से 2000 के बीच तैनात रहे दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों की संलिप्तता जांच के दायरे में लाई जाएगी। उधर डीएम डॉ नितिन गौड़ तथा एसडीएम हसनपुर हिमांशु उपाध्याय के फोन रिसीव नहीं हुए।