₹300 की रिश्वत, 49 साल पुराना केस और अब कोर्ट का बड़ा फैसला

Edited By Anil Kapoor,Updated: 08 Jul, 2026 08:03 AM

former accountant s conviction upheld in rs 300 bribe case

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने करीब 5 दशक पहले 300 रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़े गए एक पूर्व लेखपाल की 1985 की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। उच्च न्यायालय ने 41 वर्ष पुरानी आपराधिक अपील खारिज करते हुए पूर्व लेखपाल महेश चंद को सुनाई गई 1 वर्ष के...

Prayagraj News: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने करीब 5 दशक पहले 300 रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़े गए एक पूर्व लेखपाल की 1985 की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। उच्च न्यायालय ने 41 वर्ष पुरानी आपराधिक अपील खारिज करते हुए पूर्व लेखपाल महेश चंद को सुनाई गई 1 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को भी बरकरार रखा और उन्हें शेष सजा काटने के लिए 4 सप्ताह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

1977 के भ्रष्टाचार मामले की पूरी कहानी
न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने 3 जुलाई के अपने फैसले में वर्ष 1977 के भ्रष्टाचार के इस मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष यह संदेह से परे साबित करने में सफल रहा कि आरोपी ने चकबंदी की कार्यवाही के दौरान अवैध रिश्वत स्वीकार की थी। यह मामला कानपुर जिले में कृषि भूमि से संबंधित चकबंदी की कार्यवाही से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आशा देवी द्वारा कृषि भूमि के आवंटन के संबंध में दायर अपील का वीरेंद्र सिंह विरोध कर रहे थे। अभियोजन ने आरोप लगाया कि उस समय लेखपाल के पद पर तैनात महेश चंद और कानूनगो चंद्रसेन ने वीरेंद्र सिंह की भूमि का आवंटन यथावत बनाए रखने के लिए 400 रुपए की रिश्वत मांगी थी।

पाउडर लगे ₹300 लेते रंगे हाथ पकड़ा गया लेखपाल
अभियोजन के अनुसार, वीरेंद्र सिंह ने पहले चंद्रसेन को 100 रुपए दिए और बाद में शेष 300 रुपए की व्यवस्था करने के लिए अपने पुत्र जय विजय सिंह से कहा। इसके बजाय जय विजय सिंह ने सतर्कता विभाग से संपर्क किया, जिसने जाल बिछाकर कार्रवाई की। कार्रवाई के दौरान महेश चंद को अदालत परिसर के निकट एक होटल में फिनॉल्फ्थेलीन पाउडर लगे 300 रुपए स्वीकार करते हुए कथित तौर पर रंगे हाथ पकड़ लिया गया। उनके पास से चिह्नित नोट बरामद किए गए और रासायनिक परीक्षण में उनके उन नोटों के संपर्क में आने की पुष्टि हुई।

हाई कोर्ट ने साक्ष्यों को माना बिल्कुल सही
न्यायमूर्ति कुमार ने विचारण के दौरान दर्ज साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के मामले को प्रभावित करने वाली कोई महत्वपूर्ण विसंगति नहीं पाई गई। अदालत ने कहा कि सतर्कता विभाग के अधिकारियों, स्वतंत्र गवाह और जय विजय सिंह की गवाही रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार किए जाने के संबंध में एक-दूसरे के अनुरूप रही।

निचली अदालत का फैसला पूरी तरह जायज
अदालत ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई गोपनीय तरीके से की जाती है। इसकी जानकारी केवल छापेमारी दल के सदस्यों तक सीमित रखी जाती है और पूरी व्यवस्था इस प्रकार की जाती है कि आरोपी को रंगे हाथ पकड़े जाने की आशंका न हो। सभी साक्ष्यों की समीक्षा के बाद अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सफल रहा कि महेश चंद ने लेखपाल रहते हुए 300 रुपए की अवैध रिश्वत मांगी और स्वीकार की थी। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया था और आरोपी को दोषी ठहराने का उसका फैसला उचित था।

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