सपा से गठबंधन टूटने के बाद बसपा-कांग्रेस ने भी OP राजभर के लिए अपने दरवाजे किए बंद, 2024 के लिए नया साझेदार ढूंढ़ने की चुनौती

Edited By Mamta Yadav, Updated: 30 Jul, 2022 09:18 PM

after breaking alliance with sp bsp congress also closed their doors rajbhar

समाजवादी पार्टी (सपा) नीत गठबंधन से अलग होने के बाद सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के लिए अब नये चुनावी साझेदार की तलाश करना एक चुनौती बन गई है। क्योंकि अधिकांश विपक्षी दल विश्वास की कमी का हवाला देते हुए उनके संगठन...

लखनऊ: समाजवादी पार्टी (सपा) नीत गठबंधन से अलग होने के बाद सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के लिए अब नये चुनावी साझेदार की तलाश करना एक चुनौती बन गई है। क्योंकि अधिकांश विपक्षी दल विश्वास की कमी का हवाला देते हुए उनके संगठन में बहुत कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

सुभासपा के सूत्रों ने कहा कि राजभर ने 2024 के आम चुनाव के लिए बसपा और कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने के प्रति उत्सुकता दिखाई है, लेकिन उन्हें बहुत कम सफलता मिली। सपा से गठबंधन टूटने के बाद सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की तरफ हाथ बढ़ाने की कोशिश की तो बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनन्द ने उन्हें 'स्वार्थी' बताते हुए सावधान रहने की जरूरत पर जोर दिया। दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दीपक सिंह ने भी राजभर की विश्वसनीयता पर सवाल उठा दिए। बसपा और कांग्रेस नेता की टिप्पणियों को नजरअंदाज करते हुए सुभासपा अध्यक्ष ने गठबंधन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करने के उनके अधिकार पर सवाल उठाया और कहा कि कांग्रेस में सोनिया गांधी या प्रियंका गांधी और बसपा में मायावती ही फैसले ले सकती हैं।

गौरतलब है कि बसपा प्रमुख मायावती के भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनन्द ने सोमवार को किए एक ट्वीट में किसी का नाम लिए बगैर कहा, "बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती जी के शासन,प्रशासन, अनुशासन की पूरी दुनिया तारीफ करती है। लेकिन कुछ अवसरवादी लोग भी बहन जी के नाम के सहारे अपनी राजनीतिक दुकान चलाने की कोशिश करते हैं। ऐसे स्वार्थी लोगों से सावधान रहने की जरूरत है।" आनन्द का यह बयान ऐसे वक्त आया जब राजभर बसपा से हाथ मिलाने की ख्वाहिश जता रहे थे। रविवार को जौनपुर में संवाददाताओं से बातचीत में राजभर ने कहा था कि उनका व्यक्तिगत रूप से मानना है कि अब बसपा से हाथ मिलाया जाना चाहिए।

हालांकि, आनन्द के ट्वीट के ठीक एक दिन बाद सुभासपा महासचिव और राजभर के पुत्र अरुण राजभर ने मंगलवार को कहा था कि उनकी पार्टी ने ना तो बसपा से कोई संपर्क किया और ना ही गठबंधन के बारे में कोई बातचीत हुई है। कांग्रेस के पूर्व विधान पार्षद दीपक सिंह ने बातचीत में कहा, ''राजभर में विश्वसनीयता की कमी रही है। उन्हें यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि वह भरोसे के हैं।'' सिंह ने कहा कि कांग्रेस के दरवाजे उसके लिए खुलेंगे जो भरोसे का हो, राजभर एक बार पहले कांग्रेस को धोखा दे चुके हैं। उन्होंने कहा, '' राजभर ने हमसे रैलियां कराई, हमारे संसाधन का उपयोग किया और गठबंधन सपा से कर लिया। इस बार सपा से भी गठबंधन तोड़ लिया।'' सिंह ने दावा किया कि उनकी पार्टी किसी से भी गठबंधन करेगी, तो इस भरोसे पर करेगी कि वह भाजपा की ए, बी, सी टीम के रूप में न खड़ा हो।

दरअसल, राजभर की पार्टी का कोई गठबंधन लंबे समय तक नहीं चला है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले राजभर ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से गठबंधन किया था, लेकिन वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव तक दोनों के बीच दूरियां बढ़ीं और रास्ते अलग हो गये। इसके बाद वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले सुभासपा को सपा गठबंधन में शामिल कर राजभर ने विपक्षी एकता का नारा दिया था, लेकिन यह गठबंधन भी राष्ट्रपति चुनाव के दरम्यान टूट गया।

राजभर ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव को वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर संघर्ष के लिए नसीहत दी थी। अब जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी तेज हो गई है, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर राजभर किसके साथ रहेंगे। उत्तर प्रदेश की राजभर बिरादरी में पकड़ रखने वाले ओमप्रकाश राजभर के सामने अब 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए एक तरह से विकल्पहीनता की स्थिति आ गई है, क्योंकि सपा से गठबंधन टूटने के बाद बसपा और कांग्रेस ने भी उनसे दूरी बना ली है। हालांकि, अभी तक भाजपा ने राजभर को लेकर कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं की है।

इस बारे में पूछे जाने पर सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने बातचीत में कहा कि '' क्या दीपक सिंह कांग्रेस के और आकाश आनन्द बसपा के मालिक हैं। कांग्रेस के लिए फैसला सोनिया गांधी या प्रियंका गांधी को करना है, जबकि बसपा के लिए मायावती को निर्णय लेना है, ये तो बीच में चर्चा में बने रहने के लिए लोग बोलते रहते हैं।'' तो क्या आप इन दलों से तालमेल के लिए संपर्क बना रहे हैं, इस सवाल पर राजभर ने कहा कि ''आप लंबे समय से देख रहे हैं, जब चुनाव आता है, तब गठबंधन की बात होती है। इस समय कौन सा चुनाव है कि कोई गठबंधन करेगा और बात करेगा। अभी तो चल रहा है कि अपनी—अपनी पार्टी और अपना—अपना संगठन मजबूत करो। जब आपके पास ताकत रहेगी, अनुभव रहेगा, लोग रहेंगे तो 20 लोग आपसे बात करेंगे।''

राष्ट्रपति चुनाव के दौरान राजभर को उप्र सरकार ने वाई श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराई तो भाजपा से सुभासपा के गठबंधन को लेकर अटकलें तेज हो गईं, लेकिन जब भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव से पूछा गया तो उन्होंने 'पीटीआई-भाषा' से कहा कि '' ऐसे विषयों पर प्रदेश नेतृत्व की सहमति से केंद्रीय नेतृत्व फैसले लेता है, लेकिन अभी यह काल्पनिक प्रश्न है।'' उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या सुभासपा ने इसके लिए कोई पहल की है, अभी इसमें कयास लगाकर कोई भी टिप्पणी उचित नहीं होगी। ओमप्रकाश राजभर से जब पूछा गया कि अगर किसी बड़े दल से आपका गठबंधन नहीं हुआ तो क्या विकल्प के तौर पर आप छोटे दलों को फिर से एकजुट करेंगे। इस पर राजभर ने कहा कि यह तो आखिरी विकल्प है, अभी तो किसी से कोई बातचीत ही नहीं हुई है।

राजभर ने कहा, ''हम अभी संगठन पर पूरा ध्यान दे रहे हैं और प्रतिदिन प्रदेश में 50 से 60 बैठकें हो रही हैं। हमने उप्र को चार भागों में बांट दिया है, पूर्वांचल, पश्चिमांचल, मध्यांचल और बुंदेलखंड। प्रदेश में चार प्रांत बना दिये हैं और सभी प्रांतों में पार्टी के संगठनात्मक स्तर पर 14-14 मोर्चे बना दिए हैं।'' उन्होंने कहा कि संगठन मजबूत करने के बाद ही इस विषय पर कोई बातचीत होगी। उत्तर प्रदेश में एक जानकारी के मुताबिक करीब चार फीसदी राजभर बिरादरी की संख्या है, जिनमें श्रावस्ती, बहराइच, बलरामपुर, अयोध्या, अंबेडकरनगर, गोरखपुर, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, कुशीनगर, महराजगंज, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, चंदौली, सोनभद्र, मऊ आदि जिलों में करीब 10 फीसदी इस बिरादरी की आबादी है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार बसपा संस्थापक कांशीराम के सानिध्य में राजनीति का ककहरा सीखने वाले ओमप्रकाश राजभर ने अपनी बिरादरी के लोगों को एकजुट कर 2002 में सुभासपा की स्थापना की और वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव में 14 सीट पर अपने उम्मीदवार उतारे। इसके बाद वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव से ही वह छोटे दलों के गठबंधन से चुनाव मैदान में उतरने का फार्मूला बनाए, लेकिन उन्हें पहली बार सफलता 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन के बाद मिली।

भाजपा ने राजभर को समझौते के तहत आठ सीट दी और चार सीट पर इनके उम्मीदवार जीत गये। राजभर को योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की सरकार में मंत्री बनाया गया, लेकिन दो वर्ष के भीतर ही यह गठबंधन टूट गया। इसके बाद वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले राजभर ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया और 17 सीट पर अपने उम्मीदवार उतारे जिनमें विधानसभा की छह सीट पर सुभासपा को जीत मिली। राष्ट्रपति के चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के कार्यक्रम में लखनऊ में न बुलाए जाने से नाराज राजभर ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को समर्थन दिया और वह चुनाव जीत गईं। इसके बाद सपा ने एक पत्र जारी कर राजभर को कहीं भी जाने के लिए आजाद कर दिया। फिर राजभर ने सपा गठबंधन से अलग होने का ऐलान कर दिया।

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