केदारघाटी के दरमोला में एकादशी पर पांडव लीला की है अनूठी परम्परा

Edited By Nitika,Updated: 08 Nov, 2019 03:55 PM

unique tradition on ekadashi of pandav leela

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में देव उठनी एकादशी के अवसर पर शुक्रवार को अलकनंदा-मंदाकिनी नदी के संगम स्थल पर देव निशानों और पांडवों के अस्त्र-शस्त्रों की पूजा-शुद्धिकरण के साथ ही भरदार क्षेत्र के दरमोला गांव में पांडव लीला शुरू हो गई है।

रुद्रप्रयागः उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में देव उठनी एकादशी के अवसर पर शुक्रवार को अलकनंदा-मंदाकिनी नदी के संगम स्थल पर देव निशानों और पांडवों के अस्त्र-शस्त्रों की पूजा-शुद्धिकरण के साथ ही भरदार क्षेत्र के दरमोला गांव में पांडव लीला शुरू हो गई है।

पांडव नृत्य समिति के पुजारी गिरीश डिमरी ने जानकारी देते हुए बताया कि केदारघाटी के ग्राम पंचायत दरमोला में पांडव नृत्य का आयोजन सदियों से होता आ रहा है। यह एक ऐसा गांव है, जहां प्रतिवर्ष देव निशानों के गंगा स्नान के साथ पांडव नृत्य की परम्परा है। केदारघाटी में पांडवों के अस्त्र-शस्त्र छोड़े जाने का वर्णन स्कंद पुराण के केदारखंड में भी मिलता है।

मान्यता है कि एकादशी के भगवान विष्णु ने 5 महीनों की निन्द्रा से जागकर तुलसी से साथ विवाह हुआ था। यह दिन देव निशान को गंगा स्नान और पांडव नृत्य के लिए शुभ माना गया है। जो सदियों से चला आ रहा है। प्रत्येक वर्ष नवंबर से लेकर फरवरी तक केदारघाटी में पाण्डव नृत्य का आयोजन होता है। खरीफ की फसल कटने के बाद एकादशी और इसके बाद इसके आयोजन की पौराणिक परंपरा है। केदारघाटी के दरमोला भरदार में पांडव नृत्य की एक अनूठी परम्परा है। यहां प्रतिवर्ष एकादशी पर्व पर देव निशानों के गंगा स्नान के साथ पांडव नृत्य का आयोजन सदियों से चला आ रहा है। पांडवों के अस्त्र-शस्त्रों में बाणों की पूजा की परंपरा मुख्य है।

ग्रामीणों के अनुसार स्वर्ग जाने से पहले भगवान कृष्ण के आदेश पर पांडव अपने अस्त्र-शस्त्र पहाड़ में छोड़ कर मोक्ष के लिए स्वर्गारोहणी की ओर चले गए थे। जिन स्थानों पर यह अस्त्र छोड़ गए थे, उन स्थानों पर विशेष तौर से पाडव नृत्य का आयोजन किया जाता है। केदारघाटी में पाण्डव नृत्य अधिकांश गांवों में आयोजित किए जाते हैं, लेकिन अलकनंदा और मंदाकनी नदी के किनारे वाले क्षेत्रों में पांडव नृत्य अस्त्र-शस्त्रों के साथ किया जाता है। जबकि पौड़ी जिले के कई क्षेत्रों में मंडाण के साथ यह नृत्य भव्य रूप से आयोजित होता है। नृत्य के दौरान पांडवों के जन्म से लेकर मोक्ष तक का सजीव चित्रण किया जाता है।

एकादशी की पूर्व संध्या पर दरमोला, तरवाडी, स्वीली, सेम के ग्रामीण भगवान बद्रीविशाल, लक्ष्मीनारायण, शंकरनाथ, नागराजा, देवी, हित, ब्रहमडुंगी, भैरवनाथ सहित कई नेजा-निशान और गाजे बाजों के साथ गंगा स्नान के लिए संगम तट पर पहुंचे, जहां पर जागरण एवं देव निशानों की 4 पहर की पूजा-अर्चना की गई तथा एकादशी पर्व पर शुक्रवार सुबह सभी देव निशानों के गंगा स्नान कराने के उपरान्त पूजा-अर्चना एवं हवन किया गया। इसके बाद देव निशानों को गांव में ले जाकर यहां पांडव नृत्य का आयोजन किया गया। इस दिन को शुभ माना जाता है। इस पर्व के बाद शादी, ब्याह, मुंडन सहित कई कार्यक्रम आयोजित शुरु हो जाते हैं।

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