मुंहबोली बहिनों ने शुरू किया रक्षाबंधन का त्यौहार

Edited By Deepika Rajput,Updated: 14 Aug, 2019 01:45 PM

rakshabandhan festival

‘बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है, प्यार के दो तार से संसार बांधा है'' भले ही ये गाना बहुत पुराना न हो पर भाई की कलाई पर राखी बांधने का सिलसिला प्राचीन है। जिसे मुंह बोली बहिनों ने शुरू किया। रक्षाबंधन की परंपरा ही उन बहिनों ने डाली थी जो मुंह...

प्रयागराजः ‘बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है, प्यार के दो तार से संसार बांधा है' भले ही ये गाना बहुत पुराना न हो पर भाई की कलाई पर राखी बांधने का सिलसिला प्राचीन है। जिसे मुंह बोली बहिनों ने शुरू किया। रक्षाबंधन की परंपरा ही उन बहिनों ने डाली थी जो मुंह बोली थीं।

भले ही उन बहिनों ने अपने सुरक्षा के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो, लेकिन उसी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है। जीवन की रक्षा का प्रतिबद्धता, आत्मीयता और स्नेह से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने वाला रक्षाबंधन पर्व भारतीय समाज में इतनी व्यापकता और गहराई से समाया हुआ है कि इससे सामाजिक महत्त्व, धर्म, पुराण, इतिहास, साहित्य और फिल्में भी अछूती नहीं हैं। यह आत्मीयता और स्नेह के बंधन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का पर्व है।

वैदिक शोध संस्थान एवं कर्मकांड प्रशिक्षण केंद्र के पूर्व आचार्य डॉ. आत्माराम गौतम ने बताया कि श्रावण मास के पूर्णिमा दिवस पर मनाया जाने वाला यह पर्व रक्षा की प्रतिबद्धता, आत्मीयता और प्रेम का प्रतीक है। रक्षा का मतलब सुरक्षा और बंधन का मतलब बाध्य है। रक्षा के लिए बांधा गया सूत्र ही रक्षासूत्र या रक्षा बंधन है। इसकी सार्थकता एक कच्चे धागे की होती है जबकि आज रेशम और अनेक मंहगे रक्षा बंधन प्रचलन में हैं।

यह रक्षा सूत्र कोई भी किसी को बांध सकता है। पुरोहित औने यजमान को, पत्नी-पती को, माता-पिता बेेटे और बेटी को, बहिन भाई को, गुरू-शिष्य को और बहिन-बहिन को। यह बंधन रक्षा बांधने वाले और बंधवाने वाले दोनों को एक दूसरे की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।

 

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