Edited By Purnima Singh,Updated: 03 Jun, 2026 07:41 PM

देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश, जहां 2027 में होने वाला विधानसभा चुनाव अब धीरे-धीरे सियासी रण में तब्दील होता नजर आ रहा है। 403 सीटों वाली इस लड़ाई में एक बार फिर बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं ...
लखनऊ : देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश, जहां 2027 में होने वाला विधानसभा चुनाव अब धीरे-धीरे सियासी रण में तब्दील होता नजर आ रहा है। 403 सीटों वाली इस लड़ाई में एक बार फिर बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। भारतीय जनता पार्टी अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को जनता के सामने रखकर फिर से सत्ता में आने की कोशिश कर रही है, तो विपक्षी दल सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए लोगों को अपने पक्ष में करने की कवायद में लगे हैं। चुनाव के करीब आते ही रैलियों, जनसभाओं और प्रचार अभियानों में तेजी देखने को मिल रही है।
सत्ता की हैट्रिक बनाम बदलाव की चुनौती
अगर बात करें 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों की तो सभी प्रमुख दल जनता को आकर्षित करने के लिए नए-नए वादे और रणनीतियां बना रहे हैं। जहां भाजपा यूपी की सत्ता बचाए रखने के लिए या यूं कहें सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए अपने 9 साल के कामकाज और विकास मॉडल को सबसे बड़ा हथियार बना रही है। वहीं समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा भी पूरी रणनीति के साथ अपनी बिसात बिछा चुकी हैं।
विकास मॉडल के जरिए जनता को साधेगी भाजपा
एक तरफ सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर ‘डबल इंजन’ सरकार और मजबूत नेतृत्व के दम पर मैदान में है। योगी सरकार एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, डिफेंस कॉरिडोर जैसे बड़े विकास कार्यों को अपनी ताकत बना रही है। साथ ही कानून व्यवस्था और माफिया पर कार्रवाई को बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है।
PDA समीकरण साधने में जुटी सपा
वहीं दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी दल सपा के चीफ अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक पार्टी की वापसी की उम्मीद का आधार है। समाजवादी पार्टी इस बार PDA फॉर्मूले के सहारे बीजेपी को चुनौती दे रही है। अखिलेश यादव बेरोजगारी, महंगाई और किसान मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं। सपा छोटे दलों के साथ गठबंधन कर जातीय समीकरण मजबूत करने में जुटी है।
गेमचेंजर साबित हो सकती है बसपा
वहीं अगर बात करें बहुजन समाज पार्टी की, तो मायावती दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम समीकरण को साधने में लगी हैं। बसपा भी 2027 में वापसी की कोशिश में है। हालांकि पिछले चुनाव में बसपा का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था। मायावती भले ही फिलहाल ज्यादा सक्रिय नजर न आ रही हों, लेकिन बसपा को नजरअंदाज करना बड़ी राजनीतिक भूल साबित हो सकती है। क्योंकि दलित वोट बैंक पर मजबूत पकड़ रखने वाली बसपा अभी भी कई सीटों पर चुनाव में गेमचेंजर की भूमिका निभा सकती है और नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।
संगठनात्मक कमजोरी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती
वहीं कांग्रेस यूपी में खुद को फिर से खड़ा करने की जुगत में है। पार्टी महिला सशक्तिकरण, युवा और बेरोजगारी के मुद्दों पर फोकस कर रही है। हालांकि संगठनात्मक कमजोरी अभी भी कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके अलावा RLD, अपना दल, निषाद पार्टी, SBSP जैसे छोटे दल भी चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे। ये दल भले ही कम सीटों पर लड़ते हैं, लेकिन कई सीटों पर जीत-हार का गुणा-गणित बदलने की ताकत रखते हैं।
दलों ने कसी कमर, यूपी की सत्ता पर सभी की नजर
कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों, विकास के दावों और जनभावनाओं की सबसे बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है। 403 सीटों वाली इस जंग में हर वोट की कीमत होगी, हर सीट पर कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा और छोटे दलों की भूमिका भी किंगमेकर से कम नहीं होगी। 403 सीटों की इस सियासी जंग में किसे जनता का जनादेश मिलेगा, यह आने वाला समय ही तय करेगा, लेकिन इतना तय है कि 2027 का चुनाव बेहद दिलचस्प और निर्णायक होने वाला है। अब देखना ये होगा कि जनता किसके कार्यों और वादों पर भरोसा जताती है और 2027 में किसे यूपी की सत्ता की बागडोर सौंपेती है। यूपी के मुख्यमंत्री के पद पर कौन सा राजनेता अगले पांच सालों के लिए आसीन होगा।