Edited By Ramkesh,Updated: 18 Aug, 2026 08:33 PM

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने मंगलवार को कहा कि मृतक के पास से रेलवे टिकट बरामद न होना मात्र उसके आश्रितों को मुआवजा देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने 2011 में चलती ट्रेन से गिरकर हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में उसकी विधवा...
लखनऊ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने मंगलवार को कहा कि मृतक के पास से रेलवे टिकट बरामद न होना मात्र उसके आश्रितों को मुआवजा देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने 2011 में चलती ट्रेन से गिरकर हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में उसकी विधवा को आठ लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी ने अपील स्वीकार करते हुए रेलवे दावा अधिकरण के 2017 के आदेश को भी निरस्त कर दिया। रेलवे दावा अधिकरण ने शिव नारायण सिंह की पत्नी लाली के मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया गया था। शिव नारायण सिंह ने 21 नवंबर 2011 को इटावा से दिल्ली जाने के लिए लालकिला एक्सप्रेस में यात्रा की थी और सराय भूपत रेलवे स्टेशन के पास वह चलती ट्रेन से गिर गए थे।
अदालत ने कहा कि दावेदार पर यह साबित करने का प्रारंभिक दायित्व जरूर है कि मृतक वास्तविक यात्री था लेकिन केवल टिकट बरामद न होने के आधार पर मुआवजे का दावा स्वत: खारिज नहीं किया जा सकता। मामले में मृतक की पत्नी और एक अन्य गवाह ने गवाही दी थी कि शिव नारायण ने द्वितीय श्रेणी का टिकट खरीदा था इसके विपरीत, रेलवे टिकट की बिक्री का कोई रिकॉर्ड या ऐसा कोई अन्य साक्ष्य पेश नहीं किया जा सका।
अदालत ने दावा अधिकरण के इस निष्कर्ष को भी खारिज कर दिया कि मृतक का शव तीन टुकड़ों में मिला था इसलिए यह माना जाना चाहिए कि वह रेलवे पटरी पर पड़ा था और ट्रेन से कुचल गया था। पीठ ने कहा कि स्वतंत्र या विशेषज्ञ साक्ष्य के अभाव में इस तरह का अनुमान लगाकर मुआवजे के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने रेलवे को आठ सप्ताह के भीतर आठ लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया और निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किए जाने के संबंध में पूरी राशि पर भुगतान तक नौ प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज देने का आदेश दिया।