जब कांग्रेस सस्थापंक AO ह्यूम ने साड़ी पहन कर बचाई थी अपनी जान, 7 दिनों तक चंबल घाटी में छिपना पड़ा

Edited By Mamta Yadav, Updated: 16 Jun, 2022 11:25 AM

when congress founder ao hume saved his life by wearing a sari

कांग्रेस सस्थापंक ए.ओ.ह्यूम को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 17 जून 1857 को उत्तर प्रदेश के इटावा में साड़ी पहनकर जान बचानी पड़ी थी। चौधरी चरण सिंह पीजी कालेज के प्राचार्य और इतिहासकार डा.शैलेंद्र शर्मा ने गुरूवार को बताया कि ह्यूम को उत्तर प्रदेश के...

इटावा: कांग्रेस सस्थापंक ए.ओ.ह्यूम को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 17 जून 1857 को उत्तर प्रदेश के इटावा में साड़ी पहनकर जान बचानी पड़ी थी। चौधरी चरण सिंह पीजी कालेज के प्राचार्य और इतिहासकार डा.शैलेंद्र शर्मा ने गुरूवार को बताया कि ह्यूम को उत्तर प्रदेश के इटावा मे जंगे आजादी के सिपाहियों से जान बचाने के लिये साड़ी पहन कर ग्रामीण महिला का वेष धारण कर भागना पड़ा था। ह्यूम तब इटावा के कलेक्टर हुआ करते थे।      

शर्मा ने बताया कि सैनिकों ने ह्यूम और उनके परिवार को मार डालने की योजना बनाई जिसकी भनक लगते ही 17 जून 1857 को ह्यूम महिला के वेश में गुप्त ढंग से इटावा से निकल कर बढपुरा पहुंच गये और सात दिनों तक बढपुरा में छिपे रहे। एलन आक्टेवियन यानि एओ ह्यूम को वैसे तो आम तौर सिर्फ काग्रेंस के संस्थापक के तौर पर जाना और पहचाना जाता है लेकिन उनकी कई अन्य पहचानें रही हैं।

उन्होंने बताया कि अपनी जान बचाये जाने का पाठ ह्यूम कभी नहीं भूले। ह्यूम ना बचते अगर उनके हिंदुस्तानी साथियों ने उनको चमरौधा जूता ना पहनाया होता,सिर पर पगडी ना बांधी होती और महिला वेश धारण कर सुरक्षित स्थान पर ना पहुंचाया होता। ह्यूम ने इटावा से भाग कर आगरा के लाल किले मे शरण ली थी। 1912 मे इटावा में रहने वाले शिमला के संत डा.श्रीराम महरौत्रा लिखित पुस्तक ‘लक्षणा' का हवाला देते हुए चंबल अकाईब के मुख्य संरक्षक किशन महरौत्रा बताते है कि 1856 से 1867 तक इटावा के कलेक्टर रहे ह्यूम कुशल लोकप्रिय सुधारवादी शासक के रूप में ख्याति पाई।

1857 में गदर हो गया। लगभग पूरे उत्तर भारत से अंग्रेजी शासन लुप्त हो गया। आज के वक्त में यह विश्वास करने वाली बात नहीं मानी जायेगी कि एक भी अंग्रेज अफसर उत्तर भारत के किसी भी जिले में नहीं बचा। सब अपनी-अपनी जान बचा भाग गये या फिर छुप गये। लखनऊ की रेजीडेंसी या आगरा किले मे छुप गये। अपने परिवार के साथ लंबे समय तक आगरा मे रहने के बाद 1858 के शुरूआत में हयूम भारतीय सहयोगियों की मदद से इटावा वापस आकर फिर से अपना काम काज शुरू किया।      

चंबल फाउंडेशन ने अध्यक्ष शाह आलम ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुये कहा कि इटावा में 4 फरवरी 1856 को इटावा के कलक्टर के रूप में ए.ओ.हयूम की तैनाती अग्रेज सरकार की ओर से की गई। यह कलक्टर के रूप में पहली तैनाती थी। हयूम इटावा मे 1867 तक तैनात रहे। आते ही हयूम ने अपनी कार्यक्षमता का परिचय देना शुरू कर दिया। 16 जून 1856 को हयूम ने इटावा के लोगों की जनस्वास्थ्य सुविधाओ को मददेनजर रखते हुये मुख्यालय पर एक सरकारी अस्पताल का निर्माण कराया तथा स्थानीय लोगों की मदद से हयूम ने खुद के अंश से 32 स्कूलों का निर्माण कराया जिसमे 5683 बालक बालिका अध्ययनरत रहे।

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