Subscribe Now!

‘क्यूं नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बेख़बर, क्या तेरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम’

You Are Here
‘क्यूं नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बेख़बर, क्या तेरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम’‘क्यूं नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बेख़बर, क्या तेरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम’‘क्यूं नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बेख़बर, क्या तेरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम’

आगरा: बसंत की आहट के साथ ही आ जाती है उस अजीम शायर की याद, जिसने शायरी को आम आदमी में पहचान दिला दी। जी हां, हम बात कर रहे हैं उर्दू अदब के अजीम शायर नजीर अकबराबादी की। जिसने अपनी शायरी में आम जनमानस की बात कही। लेकिन ये महान शायर आज अपने शहर में ही बेगाने से है।

ताज के पहलू में खुश थे नजीर अकबराबादी
वो दौर जब शायरी दरबारों की शान थी, नवाबों की वाह-वाह के लिए लिखी जाती थी। उस समय के एक जनता शायर था। ऐसा शायर जिसे पहचानने, सुनने, समझने में हिंदुस्तान को 100 साल लग गए। वो नाम है नजीर अकबराबादी। नजीर अकबराबादी एक ऐसे शायर थे जिसे शाही अंजुमन की तलब नहीं थी। ऊंचे वजीफों की हसरत नहीं थी। वो बस ताज के पहलू में खुश था और जनता के नगमें बुनता था। 
PunjabKesari
22 वर्ष की उम्र में आए थे आगरा 
नजीर अकबराबादी का जन्म दिल्ली में सन् 1735 में हुआ। दिल्ली में ही उनका बचपन बीता और करीब 22 वर्ष की उम्र में आगरा आए। कुछ समय उन्होंने नूरी दरवाजा में किराए पर रहकर बिताया। उसके बाद वो ताज के साए में ताजगंज की मल्को गली में रहने आ गए और फिर वहीं के होकर रह गए।
PunjabKesari
नजीर को आम आदमी का भी कहा जाता है शायर
नजीर को ताज से बहुत ज्यादा प्यार था। नजीर पहले शायर है जिसने उर्दू-हिंदी में ताजमहल पर अपना पहला कलाम ताज बीबी का रोज़ा लिखा। नजीर को आम आदमी का शायर भी कहा जाता है। नजीर नें रोटी, चपाती, फलों, जानवरों पर कई कलाम लिखे। साथ ही उन्होंने सभी धर्मों के देवताओं पर कई दोहे और शायरी लिखी। बंजारानामा, मुफलिसी और ऋतुओं भी पर नजीर ने कई कलाम लिखे।
PunjabKesari
इस हाल में है शायर की मजार
आगरा के ताजगंज की मल्को गली में नजीर अकबराबादी की एक मात्र मज़ार है। इस मज़ार पर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है और चारों ओर गंदगी का आलम है। इस मज़ार की पहचान के लिए यहां पर एक बोर्ड नगर निगम द्वारा लगवाया गया लेकिन वक्त के साथ वो भी धुंधला पड़ गया है, जिसको पढ़ने में शायद आपके आखों के नंबर भी कम पड़ जाएं। मल्को गली में रहने वाले लोगों का कहना है कि इतने बड़े शायर की मजार की हालत को देख उनका मन भी उदास हो जाता है।
PunjabKesari
सर्वधर्म के रह चुके शायर
आशिक कहो, असीर कहो, आगरे का है...मुल्ला कहो, दबीर कहो, आगरे का है...मुफलिस कहो, फकीर कहो, आगरे का है...शायर कहो, नजीर कहो, आगरे का है...नजीर ने ऐसे कई नज्म लिखी और कही है। जिसको आज भी कई शायर और गजल गायक अपनी आवाज देते रहते हैं। उनकी गजलों में भी नजीर की छाप दिखाई देती है। वो कहते है कि नजीर जनकवि थे। उन्होंने हमेशा ही आम जनता की बात कही है। वो किसी एक धर्म के नहीं थे वे सर्वधर्म के शायर रहे है। वो भी नजीर की मजार की हालत को देख दुखी होते है। 
PunjabKesari
आगरा में बनाए एक कल्चर सेंटर
लोगों का कहना है कि आगरे ने देश को कई अजीम शायर और कवि दिए है लेकिन आगरा में इनके नाम पर कोई भी स्मारक नहीं है और न ही सरकार द्वारा कोई कार्यक्रम ही इनके नाम पर कराया जाता है। हम चाहते हैं कि हमारी सरकारें इनके नाम से आगरा में एक कल्चर सेंटर बनाए तभी हम इन महान शख्सियत को एक सच्ची श्रृद्धांजलि दे सकेंगे। 
PunjabKesari
क्या कहना है लोगों का 
वहीं स्थानीय लोगों क कहना है कि आगरा की जमीन की यह खासियत है कि यहां ग़ालिब पैदा हुए तो मीर तकी मीर , नजीर अकबराबादी , सूरदास ने भी आगरा का नाम अपनी लेखनी से अमर कर दिया। लेकिन अफ़सोस है कि वोटो की राजनीति करने वाले तमाम दल जहां अरबो की धनराशि अपने वोट पक्के करने में सरकारी खजाने से खर्च कर देते हैं। वहीं दूसरी तरफ ऐसी तमाम विरासतें अपने हालत पर शर्मिंदा है। 

आज नज़ीर की इस जयंती पर यह प्रश्न एक बार से फिर सोचने-विचारने का है कि आखिर क्यों ? अपने ही शहर में अजनबी है शायर नजीर अकबराबादी। 



UTTAR PRADESH NEWS की अन्य न्यूज पढऩे के लिए Facebook और Twitter पर फॉलो करें-

अपना सही जीवनसंगी चुनिए| केवल भारत मैट्रिमोनी पर- निःशुल्क रजिस्ट्रेशन