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जानिए, बद्रीनाथ मंदिर का कपाट बंद होने के बाद कहां रहती है ‘चाबी’

  • जानिए, बद्रीनाथ मंदिर का कपाट बंद होने के बाद कहां रहती है ‘चाबी’
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जानिए, बद्रीनाथ मंदिर का कपाट बंद होने के बाद कहां रहती है ‘चाबी’जानिए, बद्रीनाथ मंदिर का कपाट बंद होने के बाद कहां रहती है ‘चाबी’जानिए, बद्रीनाथ मंदिर का कपाट बंद होने के बाद कहां रहती है ‘चाबी’

देहरादून: बद्रीनाथ मंदिर, जिसे बदरीनारायण मंदिर भी कहते हैं, जो अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है। बता दें कि यह हिन्दुओं के 4 धाम में से एक है। बद्रीनाथ में भगवान की पूजा करने का अधिकार सिर्फ रावल का है, जो दक्षिण भारत का ब्राह्मण होता है। साथ ही मंदिर का कपाट बंद करते समय किसका ताला लगेगा। चाबी किसके पास होगी, जैसी सारी बातें सैकड़ों सालों पहले आदि गुरु शंकराचार्य तय कर चुके हैं।
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कौन हैं आदि गुरु शंकराचार्य?
आदि गुरु शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता प्रसिद्ध शैव आचार्य थे। उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएं बहुत प्रसिद्ध हैं। इन्होंने भारतवर्ष में 4 मठों की स्थापना की थी। जिनके प्रबंधक तथा गद्दी के अधिकारी 'शंकराचार्य' कहे जाते हैं। वो चारों स्थान हैं- बदरिकाश्रम, करवीर पीठ, द्वारिका पीठ और शारदा पीठ। इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था।
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बद्रीनाथ को मूर्ति के रूप में किया प्रतिष्ठित
आदि गुरु शंकराचार्य ने आठवीं सदी में नारदकुंड से निकालकर तप्तकुंड के पास गरुड़ गुफा में बद्रीनाथ को मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया था। बद्रीनाथ मंदिर की व्यवस्था ठीक तरह से चलती रहे, इसके लिए उन्होंने आस-पास रह रहे लोगों को कुछ अधिकार दिए। मंदिर के अदंर गर्भ गृह से लेकर प्रसाद वितरण, भोग तैयार करने का काम आदि गुरु बांटकर गए हैं। उनके द्वारा बांटे गए अधिकार का लोग आज भी पालन करते हैं।
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डिमरी ब्राह्मण तैयार करते हैं प्रसाद
बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है। उनके अलावा कोई भी भगवान को छू नहीं सकता। भागवान का प्रसाद डिमरी ब्राह्मण तैयार करते हैं और इसी को बाद में प्रसाद के रूप में भक्त ग्रहण करते हैं। डिमरी ब्राह्मण लक्ष्मि मंदिर, गरुड़ मंदिर, धर्म शिला के पुजारी भी होते हैं। भगवान का चरणामृत भी यही लोग तैयार करते हैं।
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मेहता समुदाय का धाम पर लगता है ताला
बद्रीनाथ मंदिर बंद होने के बाद मेहता समुदाय के लोग अपना ताला धाम के दरवाजे पर लगाते हैं। उसकी एक चाबी उनके पास रहती है और एक मंदिर समिति के पास। कपाट में यह लोग ही ताला लगाने के लिए अधिकृत हैं। कपाट खोलने और बंद करने का काम यही लोग सदियों से करते आए हैं। हालांकि अब एक ताला मंदिर समीति का भी लगता है।
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क्या है मंदिर की मान्यता?
एक बार भगवान विष्णु तपस्या में लीन थे। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उन्हें हिम से बचाने के लिए मां लक्ष्मी बेर के वृक्ष के रूप में उनपर तब तक झुकी रहीं जब तक वो तपस्या करते रहे। बाद में भगवान विष्णु ने उनके प्रेम और समर्पण का सम्मान करते हुए इस स्थान को बद्रीनाथ का नाम दिया, क्योंकि संस्कृत भाषा में बेर को बद्री कहा जाता है। सिर्फ गर्मियों के 6 महीने ही भक्तों को भगवान बद्रीनाथ के दर्शन होते हैं, बाकी के 6 महीने उनके कपाट बंद रहते हैं।
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मंदिर के कपाट बंद होने के क्या है कारण 
दरअसल भक्तों को दर्शन दे रहे चारधामों में बैठे भगवान शीतकालीन दिनों के लिए अपने-अपने धामों से चले जाते हैं। सर्दियों में इन मंदिरों तक जाने वाले रास्ते बर्फ से ढक जाते हैं। चारों धाम तक जाने वाले रास्ते पूरी तरह से बंद हो जाते हैं। इसलिए भक्तों को दर्शन देने के लिए मंदिर में विराजमान भगवान धाम से 6 महीने के लिए दूसरी जगह विराजते हैं।




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