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Exclusive: दुर्गा को पूजने वाली सांसद ने जब बिछा दी थी लाशें

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Exclusive: दुर्गा को पूजने वाली सांसद ने जब बिछा दी थी लाशेंExclusive: दुर्गा को पूजने वाली सांसद ने जब बिछा दी थी लाशेंExclusive: दुर्गा को पूजने वाली सांसद ने जब बिछा दी थी लाशें

लखनऊ(हरिआेम यादव): 1980 के दशक में चंबल से सटे इलाकों में खौफ का एक ही नाम चलता था, फूलन देवी। ये वो नाम था जो प्रतिशोध की भट्टी में तप-तपकर इतना गर्म हो चुका था कि कानून तपिश के डर से उसके नजदीक भी नहीं पहुंच पाता था। वह साल 1981 था, जब फूलन देवी ने बहमई गांव में जाति विशेष के 22 लोगों की निर्मम हत्या कर दी थी। इतिहास के पन्नों में इसे बहमई कांड के नाम से जाना जाता है। 10 अगस्त 1963 को कानपुर के पास गोरहा का पुर्वा गांव में पैदा हुई फूलन देवी की जिंदगी का हर चरण जुल्म, अन्याय और दहशत से भरा रहा। 
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महज 11 साल की उम्र में 24 साल बड़े व्यक्ति से शादी करा परिवार वालों ने उसके जीवन में अत्याचार की शुरुआत कर दी। शादी के बाद उसके पति ने भी उसका शोषण करना शुरु कर दिया, लिहाजा अदनी सी उम्र की फूलन ये सब न सह पाई और अपने गांव आकर माता-पिता के साथ रहने लगी। इसी दौरान फूलन के साथ गांव में ही जमींदारों ने कथित तौर पर बलात्कार किया। फूलन की जिंदगी की इसी घटना ने उसे दस्यु जगत में आने के लिए मजबूर कर दिया। 
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फूलन ने हथियार उठा लिए थे। वह घर, परिवार और गांव से निकल चंबल में डाकू विक्रम मल्लाह के संपर्क में आ गई। उन दिनों चंबल के इलाके डाकू विक्रम मल्लाह और श्रीराम की जुगलबंदी का दंश झेल रहे थे। फूलन के गिरोह में शामिल होने से विक्रम मल्लाह औऱ श्रीराम में दूरियां बढ़ने लगीं। यहां तक की झगड़े भी होने लगे। इसी बीच श्रीराम ने विक्रम मल्लाह की हत्या कर दी और फूलन को निर्वस्त्र कर बहमई गांव में नग्न अवस्था में ले गया। फूलन की आत्मकथा में लिखा है कि गांव जाकर पहले श्रीराम ने उसके साथ बलात्कार किया और फिर बारी-बारी से गांव के कई लोगों ने उस पर हैवानियत दिखाई। विक्रम मल्लाह की मौत के बाद फूलन कमजोर पड़ गई थी। 
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फूलन की जिंदगी अब एक मिशन बन चुकी थी। उसने बदला लेने के लिए गिरोह का विस्तार करना शुरु कर दिया। 1981 में उसी गांव(बहमई) में जाकर फूलन और उसके साथियों ने एक साथ 22 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। बताया जाता है कि मारे गए सभी लोगों को पहले एक साथ इकट्ठा किया गया और फिर उन पर गोलियां चला दी गईं। हालांकि बाद में फूलन ने इस घटना में खुद के शामिल होने से इंकार किया। फूलन पर आरोप सिद्ध हो चुके थे और वह पुलिस के निशाने पर आ चुकी थी। बावजूद इसके पुलिस उसे पकड़ पाने में नाकामयाब रही। 1983 में मध्य प्रदेश सरकार से फूलन ने ये समझौता किया कि वह पुलिस के सामने तभी आत्मसमर्पण करेगी जब उसे फांसी न दी जाए। फूलन कितनी कुख्यात थी, इसका अंदाजा इससे ही लग जाता है कि उसके आत्मसमर्पण को देखने हजारों लोग पहुंचे थे। 
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1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने फूलन को पैरोल पर रिहा करा दिया। इसके बाद 1996 में समाजवादी पार्टी ने उसे मिर्जापुर लोकसभा सीट से टिकट दी और वह पहली ही बार में संसद पहुंचीं। हालांकि सपा के टिकट देने से पहले इस बात पर बहुत शोर-शराबा हुआ कि एक डाकू संसद कैसे जाएगी। फूलन क्राइम की दुनिया से दूर सामाजिक जीवन जीने लगी थीं। लेकिन 25 जुलाई साल 2001 को दिल्ली में फूलन के सरकारी आवास के बाहर गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। फूलन को मारने वाले आरोपी शेर सिंह राणा ने खुलकर कहा कि उसने ही हत्या की है। हालांकि हत्या की साजिश में शुरुआती छींटे उनके दूसरे पति उमेद सिंह पर भी गए, लेकिन कोई आधार न मिल पाने पर उन्हें केस से दूर कर दिया गया। 
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दस्यु जगत की कुख्यात डकैत फूलन मां दुर्गा की भक्त थी और उनकी ही पूजा करती थी। 90 के दशक के दक्षिणार्ध में कुछ साक्षात्कारों में फूलन को अक्सर ये कहते हुए पाया गया कि उन्होंने कभी किसी बेगुनाह पर हमला नहीं किया। 1994 में जब फिल्म निर्माता शेखर कपूर ने फूलन की जिंदगी पर आधारित फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ बनाई तो उन्होंने इसका विरोध किया। यही नहीं इस फिल्म के भारत में प्रदर्शन पर रोक भी लगाई गई। आज मौत के 16 साल बाद भी फूलन देवी को कुछ लोग वीरांगना मानते हैं तो वहीं कुछ लोग अब भी बहमई कांड को लेकर उन्हें निर्मम डकैत कहते हैं।




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