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देवभूमि उत्तराखंड और देहरादून से था स्वामी विवेकानंद का गहरा नाता

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देवभूमि उत्तराखंड और देहरादून से था स्वामी विवेकानंद का गहरा नातादेवभूमि उत्तराखंड और देहरादून से था स्वामी विवेकानंद का गहरा नातादेवभूमि उत्तराखंड और देहरादून से था स्वामी विवेकानंद का गहरा नाता

देहरादून/ ब्यूरो। आज 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती है। स्वामी विवेकानंद का उत्तराखंड से गहरा नाता रहा है। वह प्रदेश के क स्थानों में आए और उन्हें देवभूमि से गहरा प्रेम रहा। यहां पर उन्होंने गहन साधना भी की। गढ़वाल और कुमाँऊ की पहाडिय़ों में उन्हें शक्ति मिलती थी। इस बारे में राज्य खाद्य आयोग की सचिव डा. सुचिस्मता सेन दासगुप्ता पांडे ने गहन शोध किया है। लंबे समय तक मौलिक काम कर उन्होंने स्वामी विवेकानंद के उत्तराखंड से रिश्तों के बारे में नवीन जानकारियां उद्घाटित की हैं।

 

देहरादून से स्वामी विवेकानंद को बहुत प्रेम था। वह 1890 और 1897 में दो बार देहरादून आए। स्वामी करूणानंद द्वारा वर्ष 1916 में आश्रम की स्थापना की गई। रामकृष्ण मिशन धमार्थ औषधालय अभी भी चल रहा है। गदाधर प्रकल्प के अंतर्गत कक्षा एक से सात तक के छात्रों को तालीम दी जाती है। 1890 में बद्री नारायण सेवा क्षेत्र में भीषण अकाल पडऩे के कारण श्रीनगर के रास्ते टिहरी होते हुए देहरादून के पर्वतीय क्षेत्र में स्वामी विवेकानंद का आगमन हुआ।

 

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राजपुर स्थित प्राचीन बावड़ी शिव मंदिर में अपने गुरू भाई स्वामी तुरियानंद को तपस्यारत देखकर विवेकानंद मंदिर में ही रुक गए। यहां पर स्वामी विवेकानंद ने स्वामी तुरियानंद के साथ मिलकर घोर तपस्या की। इस बारे में उन्होंने लिखा है कि यह स्थल चमत्कारिक है। यहां पर पहले से ही महान साधनाएं हुई हैं। साधकों व ऋषि मुनियों ने यहां पर विकट साधना की है। आज यहां पर साधना कक्ष का सुंदर रखरखाव है। इस मंदिर के परमाध्यक्ष सन्यासी स्वामी सच्चिदानंद का कहना है कि इस कक्ष में अद्धभुत ऊर्जा का प्रवाह होता है। इसलिए इस कक्ष में सधक साधना करने आते हैं। डा. सुचिस्मता पांडे कहती हैं कि चंपावत स्थित मायावती आश्रम की स्थापना स्वामी विवेकानंद के शिष्य ने की थी।

 

हालांकि स्वामी जी ने लाला बद्री शाह को पत्र लिखकर यहां पर आश्रम स्थापना करने की इच्छा जाहिर की थी। वह 1897 में देवलधार बागेश्वर में भी 47 दिनों तक प्रवासरत रहे। अल्मोड़ा के काषाय पर्वतों कषार देवी स्थित मंदिर में स्वामी विवेकानंद ने 1890 में गुफा के अंदर गहन तप किया।  यहीं पर उन्हें अपनी छोटी बहन द्वारा आत्महत्या की सूचना मिली थी। अल्मोड़ा जिले में करबला के कब्रिस्तान पहुंचे। यहं पर वह बहुत बीमार पड़ गए। फकीर जुल्फिकार अली ने उनकी बहुत सेवा की। स्वामी जी ने वहां जनसभा की और सार्वजनिक तौर पर फकीर को सम्मानित किया। 1890 में स्वामी विवेकानंद कलकत्ता से से सीधे उत्तराखंड पहुंचे।

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ननीताल से बद्रीकाश्रम की ओर जाते हुए तीसरे दिन कोसी नदी तट पर ध्यानमग्न हो गए। यहां पर उन्हें दिव्य अनुभूतियां हुईं। इसी तरह स्वामी विवेकानंद ऋषिकेश स्थित चंद्रेश्वर महादेव मंदिर एवं कैलाश आश्रम में तपस्यारत रहे। विवेकानंद आश्रम एवं श्री रामकृष्ण सेवा आश्रम की स्थापना स्वामी विरजानंद द्वारा की गई।  डा. सुचिस्मता पांडे का कहना है कि स्वामी विवेकानंद को उत्तराखंड से गहरा प्रेम था। वह यहां पर साधना करने आते रहे। यहां पर उन्हें शक्ति प्राप्त होती थी। 



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